न दूध न रोटी के वो टुकड़े नज़र आते हैं,
मेरे शहर में पाव और पीज़ा के रगड़े नज़र आते हैं,
न मेरे गाँव की हवा न वो छप्पर छावँ नज़र आते है,
ऊँची मीनारों के नीचे दबे संस्कृति के पाँव नज़र आते हैं।। राही (अंजाना)
न दूध न रोटी के वो टुकड़े नज़र आते हैं

Comments
2 responses to “न दूध न रोटी के वो टुकड़े नज़र आते हैं”
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Super
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Thank you
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