पत्थर ही पत्थर है दिल की जेब मेँ
है बड़ी सच्ची मगर गर्दिशों की बात है
अब के गर्मिओं मेँ ठंडक है तो हैरत किसलिए
किस कदर गर्मियां थी पिछली सर्दियों की बात है
किस कदर ओढ ली थी तुमने ख़ामोशी की चादर
अब के गर्मिओं मेँ ये आई कैसी बरसात है
न कोई शिकायत न कोई मूह फेरने की रस्म
ऐसी चुप सी मुलाक़ात भी कोई मुलाकात है
तेरे सवालों की कोई किताब नहीं ‘अरमान ‘
ज़िंदगी तो खुद अपनी एक सवालात है
पत्थर ही पत्थर ——–
राजेश ‘अरमान ‘
पत्थर ही पत्थर है दिल
Comments
2 responses to “पत्थर ही पत्थर है दिल”
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वाह
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Wow
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