परिंदा

सोये हुए मेरे अरमानों को उठाने आया था कोई,
कल रात मुझको चुपके से जगाने आया था कोई,

के एक उम्र बीत गई थी अँधेरी चार दिवारी में मेरी,
खुले आसमाँ में मुझको सैर कराने आया था कोई,

हार कर यूँही छोड़ दिए थे जब हाथ पैर अपने मैंने,
तब परिंदे सा हौसलों के पंख लगाने आया था कोई॥

राही अंजाना

Comments

4 responses to “परिंदा”

  1. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    Bahut khoob bhai

  2. Abhilasha Shrivastava Avatar

    Ur ideas force us to read ur poems… Too good

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