Site icon Saavan

प्रेम विरह

प्रेम विरह

क्या सही है ,क्या गलत ,
ना जानू ।
पर आंखें  टपक- टपक
नयन-जल बौछार में ;
भीगा तनबदन,
क्या करूं? क्या ना करूं ?
ना जानू।

नाराज़ हूं ;मैं खुद से
पर क्यो वो नाराज़ हैं ?
ग़लत मैं थी या वो ?
ना जानू ।

पर क्यों ना रह पाऊ?
क्यों ना कह पाऊं?
हर दूख , हर पीड़ा
सह जाऊं,
क्रोध को उनके,
जफ़ा  को उनकी
पानी-सा समझ पी जाऊं
पर कैसे मनाऊं उनको ?
ना जानू।

एक कक्ष में
दो परिंदे ,
कैसे ?कब से ?
हम हो गए
ना जानू।

कुछ भी तो ना भाता ,
उन बिन,
एक दिन भी  सौ साल लगे
कितना मोह होने पर भी
खफा तुम कैसे हो गए
ना जानू ।

—- मोहन सिंह मानुष

Exit mobile version