फूलों की हसरत की ,यही कसूर है मेरा
काटें ही काटें मिले ये नसीब है मेरा
सोचा था तूफां से कस्ती पार निकल जाएगी
तूफां का क्या कसूर, निकला नाखुदा नासेह मेरा
कल तक जो अपने थे बन गए बेगाने खास
रिश्तों की डोर से कुछ ऐसा है ताल्लुक मेरा
फूल लगे गैर मुझे काटें कुछ अपनों से लगे
बस यही गुलशन से है शायद रिश्ता मेरा
याद कर के फिर हो जाता उदास ‘अरमान’
सूखे पत्तों की तरह हो गया वज़ूद मेरा
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.