फेहरिस्त में भुलाने के नाम, मैं रोज़ सजा लेता हूँ
इसी बहाने मैं सबको , याद करने का मज़ा लेता हूँ
चाक किस्मत के रहने दो ताउम्र मेरी जागीर की तरह
अपने हिस्से के गुनाहों की मैं हर रोज़ क़ज़ा लेता हूँ
आये मौसम कोई भी मगर, टिकते कहाँ बदलते रहते है
मैं वो मौसम हूँ जो सदा ,खुद में छुपा ख़ज़ां लेता हूँ
तेरे खत आज भी रखता हूँ ,किसी वसीयत की तरह
रोज़ लिख के तुझे खत ,तन्हाइयों में खुद जला लेता हूँ
क्या कोई किसी को भूलने की , कोई दवा होती है
तमाम कोशिश कर के देखा मगर ,खुद ही को भुला लेता हूँ
क्या परस्तिश तेरी पशेमाँ होके बस रह गई ‘अरमान’
चल एक बार फिर तेरी बंदगी के , इलज़ाम उठा लेता हूँ
राजेश’अरमान’
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