कल तक जिस आँगन में पली और बड़ी हुई
आज उसी के लिए पराया हो गया है
कल तक जिस चीज़ को मन करता उठाया
आज अपने वो हाथों को बाँधे बैठी है
कल तक जो करती थी अतिथि सत्कार वो
अब खुद उसी जगह पर आ बैठी है
कल तक जो सारी बातें साझा करती थी
आज वो कई बातों को छिपाये बैठी है
कल तक तो थी हर जिम्मेदारी से दूर
आज वही जिम्मेदारियों को संभाले खड़ी है
कभी रहती न थी चुपचाप और गुमसुम
आज वही एकांत किसी कोने में खड़ी है
कल तक तो थी सभी बंधनों से मुक्त
आज वो हज़ारों बंधनों से बंधी है।।
बदलती जिंदगी
Comments
7 responses to “बदलती जिंदगी”
-

सुन्दर रचना
-

Thanks
-
-
धन्यवाद सर जी
-

nice
-
Thanks
-
-

अति सुन्दर
-

वाह
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.