बरसों पहले

बरसों पहले
बंटी थी मरकज से

गणतंत्र के नाम पर
कोई आजादी
जैसी चीज

चंद गिने-चुने
रसूखदारो के बीच

ये सिलसिला
फिर यूँ ही
साल दर साल
चलता रहा

झोपडी का वो
स्वराज
डरा सहमा सा
कोठियों में
पलता रहा

आज भी
यही हो रहा है

उस डरी सहमी सी
आजादी के लिए
मुल्क
रो रहा है

Comments

3 responses to “बरसों पहले”

  1. Udit jindal Avatar
    Udit jindal

    nice sir ji

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar
    महेश गुप्ता जौनपुरी

    वाह जी वाह

  3. राम नरेशपुरवाला

    Wah

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