बेटी
बेटी
खौल उठा खुन मेरा
देख कर इस मंजर को
थैले में कही कचरे में कही
मरी पड़ी हैं नन्ही बेटी
वो खुदगर्ज को मैं कैसे समझाऊ
जो ढुढ़ते हैं यौवन में बेटी
लगता हैं हैवानियत भरी हैं
इस भोले भाले चेहरे में
हर एक इंसान में दरिन्दा हैं
भला इसे पहचाने कौन
मौन पड़ी हैं वह माँ भी
जिसने साजिश में हाथ बटाया
फूल सी बच्ची का
अपने हाथो से गला दबाया
थु हैं उनके भरी जवानी पर
जो ऐसा घृणीत कर्म करते हैं
बेटी माँ से ही आज डरने लगी
गर्भ में ही थरथरीने लगी
डर डर कर आती हैं इस दुनिया में
अपनी अस्तित्व को बचाने के लिए
महेश गुप्ता जौनपुरी
Wah