कम्बख्त वो हमारे सामने बेवजह ही मुस्कुरा गऐ
बेवजह ही हम उनकी बाहोँ में आ गऐ
खबर न थी जमाने को इस नए चमन से रिश्ते की
हम भी बेखबर जमाने से नैना लड़ाते चले गए
दिन ब दिन मोहब्बत में मरते चले गए
उनके ख्वाबें में कम्बख्त कहाँ कहाँ नहीं गए
खौफ न था किसीका दिल ए पनाह में उनकी
लिपटकर सीने से उनके कहाँ थे खो गए
आहिस्ता आहिस्ता जालिम जमाना जुर्म बढाने लग गया
हम भी रफ्ता रफ्ता कम्बखत इश्क बढाने लग गए
बेवक्त तवल्लुन भरी आँखे खोज में खोई उनकी
बोझिल इन नयनों के हम तगव्वुर में लग गए
बेवजह
Comments
3 responses to “बेवजह”
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Nice poetry…
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thanks ji
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बहुत बढ़िया
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