भूल जाना मोहब्वत को मुमकिन नही
भूल जाने की तुम यूँ ही जिद्द न करो
अश्को को तुम छुपा लोगे माना मगर
इन नजरों को कैसे संभालोगे तुम
ये होठो की लाली झूटी सही
इन सांसों को कैसे संभालोगे तुम
ये आएंगी मिलने की रुत फिर वही
सच मे मिलने कभी भी न आओगे तुम
इस दिल की मुझे क्या पता क्या कहूँ
बिन मेरे जिंदगी क्या बितालोगे तुम
इस दुनियां में फिर मिल गए हम कभी
खुद को खुद से ही कैसे छुपा लोगे तुम
के इतना आसां नही ये कोई खेल है
तुम न मानो मगर जन्मों का मेल है
मैं तो जी लूंगा इक तेरे खाब में
तेरी चाह में और तेरी राह में
तेरी आँखों मे आंसू नही है पसंद
ये ही सोच रख लेंगे तेरा भ्रम
मेरी सांसो को अब भी यही काम है
जीना मरना इन्हें बस तेरे नाम है
अपने ख़्वाबों की तुमसे अब क्या कहूँ
तेरे ख़्वाब अब भी मेरे ख़्वाब है
जिंदगी से मुझे कुछ गिला ही नही
इक तेरे प्यार में ये जहाँ जी लीया
मौत आ जाये चाहे कभी भी मगर
मुलाकात का एक सफर दीजिये
मेरे मरने से पहले ओ बेखबर
मौहब्बत का कुछ हक़ अदा कीजिये
चलिए आइये आप फिर से वही
जहां से चले थे संग मिल हम कभी
जिंदगी तो मुझे बड़ी भारी रही
मौत को मेरी आसां बना दीजिये
चले आईये आप फिर से वही…
@प्रदीप सुमनाक्षर
भूल जाना मोहब्बत को मुमकिन नही
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One response to “भूल जाना मोहब्बत को मुमकिन नही”
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Good
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