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मन के कोंण*******

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हे आराध्य प्रेम !
आज मैं तुम्हें
प्रणाम करती हूँ
क्योंकि तुम ही हो
जिसने मुझे जैविक से
सामाजिक प्राणी बनाया
मेरे अन्तस में भाव स्फुटित हुए
मन के कोंण रोम-रोम को
सहला बैठे
बंजर धरती पर पुष्प खिल उठे और
मेरे अंतर्मन में किसलय
निकलते लगे
तुम्हारे ओज के
आलोक से मैं रति समान
मनमोहिनी बनी
तुम्हारे आगमन से ही मैं
परिपूर्ण हुई
मेरे अंतस में कविताओं का
संगम भी तुम्हीं से हुआ
मैं राधा भी तुम्हारी कृपादृष्टि
से बनी और तुलसीदास भी !!
इन उपहारों के लिए
हे आराध्य प्रेम !
मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ….

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