मन के कोंण*******

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हे आराध्य प्रेम !
आज मैं तुम्हें
प्रणाम करती हूँ
क्योंकि तुम ही हो
जिसने मुझे जैविक से
सामाजिक प्राणी बनाया
मेरे अन्तस में भाव स्फुटित हुए
मन के कोंण रोम-रोम को
सहला बैठे
बंजर धरती पर पुष्प खिल उठे और
मेरे अंतर्मन में किसलय
निकलते लगे
तुम्हारे ओज के
आलोक से मैं रति समान
मनमोहिनी बनी
तुम्हारे आगमन से ही मैं
परिपूर्ण हुई
मेरे अंतस में कविताओं का
संगम भी तुम्हीं से हुआ
मैं राधा भी तुम्हारी कृपादृष्टि
से बनी और तुलसीदास भी !!
इन उपहारों के लिए
हे आराध्य प्रेम !
मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ….

Comments

15 responses to “मन के कोंण*******”

  1. प्रेम का मानवीकरण कर मानव तथा जैविक प्राणियों में अंतर करने वाला बताया है

  2. Satish Pandey

    प्रेम ही जीवन है, प्रेम की ही सत्ता है, बिना प्रेम के सब कुछ शून्य है। प्रेम का सुंदर मानवीकरण।

  3. Geeta kumari

    प्रेम की बहुत सुंदर व्याख्या की है प्रज्ञा…और प्रेम का मानवीकरण तो सोने पे सुहागा है।प्रेम के बिना सचमुच ही सुखद जीवन नहीं है।
    बहुत सुंदर रचना।

  4. वाह अतिसुन्दर

  5. प्रेम की बहुत सुंदर
    व्याख्या

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    प्रेम की बहुत सुंदर परिभाषा

  7. बहुत ही सुन्दर शब्दों में प्यार को परिभाषित करने की सफल चेष्टा ।

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