मायका
कुछ अक्स उभरते यादों से ,
कुछ शब्द गूंजते कानों में ,
बचपन की चौखट को छूकर ,
कुछ नाम महकते इन हवाओं में।
निम्मी, नीमु,निमिया की धुन अक्सर बजती इन कानों में ।
बहुत दूर सुनाई सी देती जैसे मिश्री धुन इन कानों में ।
जब भी उन गलियारों से गुजरो,
बचपन वापस आ जाता है ।
मन मस्त मगन हो जाता है, बारिश की पहली बूंदों सा, मेरे मन को बहुत भिगोता है ।
मन मस्त मगन हो जाता है
निमिषा सिंघल
मायका
Comments
9 responses to “मायका”
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Waah
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🤩🤩
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Heart touching
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Thanks
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बहुत सुंदर रचना
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,😀
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Nice
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😀😀
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o ho ho
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