NIMISHA SINGHAL, Author at Saavan's Posts

हम आंखों में बस देखेंगे

चलो चांद पर चलकर बैठेंगे, कुछ नैन मटक्का खेलेंगे। क्या दिल में है अरमान तेरे! क्या दिल में है अरमान मेरे! तारों की छैयां बैठेंगे, हम आंखों में बस देखेंगे। तुम भी पढ़ना मैं भी देखूं आखिर मेरी क्या चाहत है? तुम खो जाना, तब मैं ढूंढूं ! तुम्हें मेरी कितनी जरूरत है। सिर्फ खेल नहीं, यह जीवन है। इप्पी- दुप्पी तुम समझो ना। शतरंज नहीं ना चौपड़ है, चालो पे चाले चलना ना। दिल को मेरे जो जाती है, वह सीधी सादी... »

वह सांवली सी लड़की

गिट्टू सी लड़की सांवली सी सूरत। लिए घूमती थी ढेर बच्चों की पंगत। कुछ लिए ढपली, कुछ गाते राग। मुंह और हाथों से बजाते थे वो साज। भूखा पेट रोटी की तड़प आवाज थी उनकी दमदार कड़क। गाते ना थकते वह गुदड़ी के लाल। सोचना था काम कैसे होगा? दो वक्त की रोटी का इंतजाम। पटरी पर सोते ये बचपन ये इंसान काश इनका भी जीवन कुछ होता आसान। निमिषा सिंघल »

शिकायतें

आना मिलने बादलों के पार, शिकायतों का पुलिंदा भरा है दिल में मेरे। पिछले और उससे भी पिछले कई जन्मों में जो तुमने कुछ दर्द दिए थे! और मेरे आंसू निकल पड़े थे। उन सब का हिसाब करना है तुमसे। मेरे साथ चलते चलते पीछे मुड़ मुड़ कर खूबसूरत बालाओं को जो तुम चोरी चोरी देखा करते थे और मेरे दिल में एक कसक सी उठती थी। उन सब का हिसाब भी तो करना है तुमसे मुझे। मेरे कुछ लम्हे कुछ खत जो मैंने खर्च किए थे तुम पर! वह... »

देवदास

आधा चांद खिला होगा जिस दिन उस दिन मिलने आऊंगा। अपनी नीलकमल सी आंखों में मेरा इंतजार रखना। मैं चंद्रकांता का वीरेंद्र बनकर आऊंगा। महुआ के पेड़ से पक कर झड़े फूल से तैयार ताजी ताड़ी सी तुम। और मैं पारो के देवदास सा तुम्हारा दास! तुम मेरे लिए पारिजात के फूलों के समान मानसिक सुकून देने वाली औषधि हो। चंपा के समान सुगंधित तुम्हारी देह मेरे मृतप्राय मन में नए प्राण फूकती है। रातरानी के फूल के समान तुम्हा... »

अमोली

कानों में ठूठे लगाए, बहर भट्ट सी! ज्ञान के प्रभाव से आत्मचित्त, मोहक सुवर्णा सी। चेहरे पर कठोर भाव, प्रेम में टूटी शहतीर सी। तापसी! बिन प्राणों के शवास सी। स्वरागिनी! खुद में डूबी आत्ममुग्ध ,स्वप्नली सी। नाकाम थी सारी कोशिशें, उसके आकर्षण से छूट जाने की। शुष्क चेहरा, तीखी निगाहें पता नहीं कहां सीखी थी? ऐसी अदाएं दिल जलाने की। उसकी सुंदरता में डूबते ही उसका व्यक्तित्व उतर जाता था दिल की गहराइयों मे... »

वो मै है थी

एक लम्हा गुजरा मेरे पास से, गुजर गई एक पल में मैं तुम्हारे आसपास से। और तुम जान भी न सके, कि हवा जो तुमको छू कर गई थी! वह मैं ही थी। सिहर उठे थे तुम, और वह सिहरन में ही थी । निमिषा सिंघल »

अद्भुत तुम

तानाशाह से तुम! क्रोध की तीव्रता में कर देते…. सब कुछ हवन। बचपन में झेली गई मानसिक प्रताड़ना, ने बना दिया तुम्हे शिला, ज्यो थीअंदर से नरम। प्यार भी आंखें दिखा- दिखा करते हो, हंसी आती है तुम्हारी इस बनावटी शक्ल और बच्चों सी अक्ल पर। अद्भुत हो तुम अपने आप में, तुम सा बिरला ही कोई होगा इस पूरे ब्रह्मांड में। निमिषा सिंघल »

बैचैन दिल

वह घड़ी बड़ी अजीब थी! आजिज था मन खुद अपने आप से। क्या ना कहा ! क्या ना सुना! अपने आप से। बेचैन था दिल दूर जा रही पदचाप से। धुंधला रहा था वजूद ….. आंसुओं की भाप से। निगाहें थी … कि हट ही नहीं रही थी। भयभीत था दिल एकाकीपन के श्राप से। सीने में थी जलन, आंखों में थे हजारों सवाल, जिन का हल पूछ रही थी मैं अपने आप से। निमिषा सिंघल »

हमें तुम याद आते हैं।

बसावट मेरे दिल में अजनबी तुम क्यों बसाते हो? चलो छोड़ो! बहुत अब हो चुका मिलना, मेरे दिल को अभी भी तुम ठिकाना क्यों बनाते हो? दूर बैठे हो तुम कितने! कि मुझ से मिल नहीं सकते वहीं बैठे निगाहों को निशाना क्यों बनाते हो? समय जब है नहीं तुमको कि आके मिल भी लो एक पल! तो अपनी रूह का पिंजरा नहीं तुम क्यों बनाते हो? क्यों आ जाते बिना मेरी इजाजत रोज मिलने को???? कि दिन ढलता नहीं और हिचकी बन गले पड़ ही जाते ह... »

हमें तुम याद आते हो।

बसावट मेरे दिल में अजनबी तुम क्यों बसाते हो? चलो छोड़ो! बहुत अब हो चुका मिलना, मेरे दिल को अभी भी तुम ठिकाना क्यों बनाते हो? दूर बैठे हो तुम कितने! कि मुझ से मिल नहीं सकते वहीं बैठे निगाहों को निशाना क्यों बनाते हो? समय जब है नहीं तुमको कि आके मिल भी लो एक पल! तो अपनी रूह का पिंजरा नहीं तुम क्यों बनाते हो? क्यों आ जाते बिना मेरी इजाजत रोज मिलने को???? कि दिन ढलता नहीं और हिचकी बन गले पड़ ही जाते ह... »

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