NIMISHA SINGHAL, Author at Saavan's Posts

जनता कर्फ्यू

कहर ढा रही प्रकृति हर पल, कितनी आहें समेटे भीतर, हर दरिंदगी, हर हत्या का चुकता आज हिसाब यही है, एक तरफ पलड़े में आहें, एक तरफ संपूर्ण विश्व है, इतनी बड़ी कायनात पर एक सुक्ष्म जीव की आज धमक है एक तरफ सारे आका है, एक तरफ एक तुच्छ जीव है। कांप रहे डर से सब थरथर, घबराहट का हर जगह दंगल। छीक भी दे तो डर से हाफे भयाक्रांत हो हर पल कांपे। दिन हीन जन खुद को पाते, यमराज साक्षात नजर हैं आते, अभी एक कहर से उब... »

कौन हो तुम?

मैने बहुत सोचा अब नहीं मिलूंगी तुमसे, नहीं कहूंगी कुछ भी। कोई फरमाइश नहीं करूंगी कन अंखियों से देखूंगी भी नहीं। पर इस दिल का क्या करू, तुम्हारी आहट, पदचाप महसूस करते ही, धड़कने बहकने लग जाती है। बिना देखे ही जान लेती है तुम्हारी उपस्थिति। हैरान हूं मै! आखिर कैसे संभव है? इस लेखनी को है स्याही का नशा और मुझे तुम्हारे आने की तलब। जैसे पलाश के फूल और आम की बौर की सुगंध खीच लेती है बरबस अपनी ओर अचानक!... »

प्रेम

चिरायु,चिरकाल तक रहने वाला चिरंतन है प्रेम, निष्काम, निः संदेह निश्चल है प्रेम। पुनरागमन, पुनर्जन्म ,पुनर्मिलन है प्रेम। संस्कार, संभव संयोग है प्रेम, लावण्य, माधुर्य, कोमार्य सा प्रेम। निर्वाक,निर्बोध,निर्विकल्प है प्रेम, यामिनी,मंदाकिनी, ज्योत्सना सा प्रेम। यशगान,गंधर्वगान,स्वर लहरियों सा प्रेम। स्खलित हुआ जो हृदय से वेद ऋचाओं सा प्रेम। जवाकुसुम, कुमुदनी,परिमल सा प्रेम अक्षरक्ष‌:, पांडुलिपि, स्व... »

मै और तुम

मै और तुम ————- अतीत के फफोले, मरहम तुम। अध्याय दुख के सहारा तुम। तपस्या उम्रभर की, वरदान तुम। बैचेनिया इस दिल की, राहत तुम। दिल में फैली स्याही, लेखनी तुम। अक्षुष्ण मौन इस दिल में, धड़कनों का कोलाहल तुम। रुदन धड़कनों का, मुस्कुराहट तुम। लौह भस्म सा ये दिल, चुम्बक तुम। पिंजर बद्घ अनुराग उन्माद तुम। बहती धारा सी में, सागर तुम। निमिषा सिंघल »

प्रारब्ध

प्रारब्ध ——— सदियों से ठंडी, बुझी, चूल्हे की राख में कुछ सुगबुगाहट है। राख़ में दबी चिंगारियों से चिंतित हूं मैं! अपने गीले- सूखे मन की अस्थियों का पिंजर… दबा आयी थी मैं उस गिरदाब (दलदल) में….. वहां कमल उग आए है। राख में दबी चिंगारियों के भग्नावशेषों से उठता धुंआ जैसे लोहे के समान चुम्बक की ओर खिचा चला जा रहा हो.. धुएं को जैसे खीच लिया गया हो फुंकनी से उल्टा । बांध लि... »

ऊर्जा पुंज

ऊर्जा पुंज ————- तुम ऊर्जा पुंज …..और तुम से बहता अविरल तेज! बन जाता है मेरे लिए प्रेरणा .. सृजन की। मेरे हृदय में बहने लगती है धारा….. जो जा मिलती है तुमसे….. और उपजने लगती हैं कुछ नन्ही कोपल जो जगाती है मुझे नींद से……। उठो! चलो लिखना है तुम्हें। और मैं एक आज्ञाकारी शिष्या सी, ”जी आचार्य जी “कहकर चल पढ़ती हूं कागज और कलम की ओर…R... »

आहुति

आहुति ————— तुम्हारे साथ रागात्मक संबंध…. और वीणा के तार सा झंकृत मेरा हृदय….. तुम्हारा मेरा अद्भुत अनुराग …. और अंखियों की लुकाछिपी….. सुकून देती है। एक तारतम्य हमारे बीच….. और प्रेम की पंखुड़ियों से सजे मधुर शब्द…. जो देते हैं एक लय एक ताल…. और जाग उठती है जिजीविषा। अट्टालिका पर रहते हो फिर भी …. अगाध अनुराग में डूबे त... »

पुरुष

इतना भी आसान नहीं होता पुरुष होना। जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर हरदम मुस्कुराना होता है। एक पुरुष को सशक्त होना पड़ता है अपने परिवार के लिए। वह समस्याओं बाधाओं की शिकायत नहीं करता बल्कि खुद ही ढूंढता है हल उन समस्याओं से बाहर आने का। बाहर से कठोर अंदर से नरम, कभी-कभी अपना कठोर आवरण तोड़ बाहर आ जाता है अपना बचपन जीने। कुछ पल बचपन जी कर फिर से खुद को बना लेता है कठोर। अपने परिवार के लिए पुरुष कर्ता,धर... »

मौन संवाद ईश्वर से

मौन संवाद ईश्वर से ———————– हे ईश्वर! मूर्त रूप में विद्यमान प्रेम हो तुम। अस्पृश्य शब्द है ही नहीं शब्द कोष में तुम्हारे ! बेहद आलोकिक अनुभूति है तुम्हारे संसर्ग में, इस रंग बदलते आसमान तले भी बसेरा है तुम्हारा। मौन खड़े चुपचाप विध्वंस देखते हो! सुकून बेचते हो अपने सानिध्य तले। हृदय की घबराहट ,मन की छटपटाहट अनायास ही खींच लेती है तुम्हारी ओर। किस भा... »

होली खेले रघुवीर बरसाने में

होली खेले रघुवीर बरसाने में ______________________ होली खेले मोसे रघुवीर बरसाने में, जाऊँ मैं जाऊँ कित ओर बरसाने में। रंग, अबीर हवा में उड़ायो, रंग मल मल के मुझे सतायो, हाथ पकड़ दिया मोड़ बरसाने में। गुपचुप आकर रंग लगायो, पिचकारी से मुझे भिगायो, डाले गलबहियां चितचोर बरसाने में। अच्छी लागे हँसी ठिठोली, मीठी लागे तोरी बोली, काहे करे मोसे अठखेली लड़ईया में। रंग दिया काहे अपने रंग में, गिर -गिर संभलू ... »

पलाश के फूल

पलाश के फूल ——————- लाल बिछौना बनी बनस्थली जब अग्निदेव उतर आए। अपना अदभुत रूप दिखाने, पलाश के वृक्ष में आ समाए। झड़े जहां शीतल अंगारे, बाल चंद्रमा से छाए। धरती को सिंदूर दिया, बसंत का स्वागत किया। पलाश के फूलों की बात ही निराली, विरह में जलते प्रेमियों की व्यथा ही कह डाली। जिस तरह प्रेमी जन का प्रेम में जलना ही अनुराग है। उसी तरह आधे जले, आधे खिले पलाश के फूलों ... »

श्याम के रंग में राधा दीवानी

प्रीत की डोरी बांधें चली आई, तुझसे श्याम होली खेलन चली आई। बांसुरी तुम्हारी मुझको है प्यारी, दीवानी राधे गोपियां सारी। बांसुरी के स्वर लहरी में छुपा लो, कान्हा मुझे होठों से लगा लो। पिया के संग बांसुरी में है रहना, आज श्याम मोहे तुझे है रंगना। मुझ पर चढ़ा तेरी प्रीत का जादू, रंगों की नेह से मन बेकाबू। तू क्या नटखट हंसी उड़ाता? सबको तो उंगलियों पर नाचता। कौन सा जादू जादूगर सीखा, बरसाने तेरे रंग में... »

श्याम के रंग में राधा दीवानी

प्रीत की डोरी बांधें चली आई, तुलसी श्याम होली खेलन चली आई। बांसुरी तुम्हारी मुझको है प्यारी, दीवानी राधे गोपियां सारी। बांसुरी के स्वर लहरी में छुपा लो, गाना मुझे होठों से लगा लो। पिया के संग बांसुरी में है रहना, आज श्याम मोहे तुझे है रंगना। मुझ पर चढ़ा तेरी प्रीत का जादू, रंगों की नेह से मन बेकाबू। तू क्या नटखट हंसी उड़ाता, सबको तो उंगलियों पर नाचता। कौन सा जादू जादूगर सीखा, बरसाने तेरे रंग में भ... »

पुरुष

इतना भी आसान नहीं होता पुरुष होना। जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर हरदम मुस्कुराना होता है। एक पुरुष को सशक्त होना पड़ता है अपने परिवार के लिए। वह समस्याओं बाधाओं की शिकायत नहीं करता बल्कि खुद ही ढूंढता है हल उन समस्याओं से बाहर आने का। बाहर से कठोर अंदर से नरम, कभी-कभी अपना कठोर आवरण तोड़ बाहर आ जाता है अपना बचपन जीने। कुछ पल बचपन जी कर फिर से खुद को बना लेता है कठोर। अपने परिवार के लिए पुरुष कर्ता,धर... »

वृक्ष लगाओ खुद को बचाओ

धरती पनपाती वृक्षों को, वृक्षों पर बसेरा जीवो का। ये वृक्ष नहीं ये मुखिया हैं, धरती माता का प्यार यहां। कितना सुंदर ये घर बगिया, रहते सुंदर परिवार यहां। कुछ जा रहते कोटर के अंदर कुछ सो जाते पत्तों में छुप कर। कुछ करते बसेरा डालो पर, कुछ रहते बिल , घोसलों में। हंसते- खेलते परिवार यहां, उजले- उजले घर द्वार यहां। थोड़ा सा टुकड़ा धरती का, पनपा जिसमें कुनबा कितना। एक तरफ यहां इंसान देखो! धरती को घेरे ज... »

पेड़ लगाओ धरती बचाओ

धरती पनवाती वृक्षों को, वृक्षों पर बसेरा जीवो का। ये वृक्ष नहीं ये मुखिया हैं, धरती माता का प्यार यहां। कितना सुंदर ये घर बगिया, रहते सुंदर परिवार यहां। कुछ जा रहते कोटर के अंदर कुछ सो जाते पत्तों में छुप कर। कुछ करते बसेरा डालो पर, कुछ रहते बिल , घोसलों में। हंसते- खेलते परिवार यहां, उजले- उजले घर द्वार यहां। थोड़ा सा टुकड़ा धरती का, पनपा जिसमें कुनबा कितना। एक तरफ यहां इंसान देखो! धरती को घेरे ज... »

दंगाई

दंगाई ——- आजाद देश में रहकर तुम, आजादी पाना चाहते हो! सही बात समझ में आती नहीं, और द्रोह यहां फैलाते हो!! अनपढ़ लोगों को फुसलाकर, भ्रामक बातें फैलाते हो। जिस देश में रहते खाते हो, उसकी संपत्ति जलाते हो!!!! है शर्म जरा तो डूब मरो!! इस्लामिक देशों में बस जाओ। भेड़िए बने जो फिरते हो, जाओ. …. कुछ पल वहां भी गुज़ार आओ। यहां मनमानी तुम करते हो! पत्थरबाजी भी करते हो। कागज की तरह जलाते ह... »

दंगे

दंगे —- रात के छम्म सन्नाटे में, एक भय की आहट है। घबराहट की दस्तक है, कोई है!! का एहसास है। कल क्या होगा? की सोच है। बीते कल तक जो जिंदगानीया शांति थी आज उनमें एक जलजला सा समाया है। ऐसा क्यों है? क्या हजारों जिंदगियां एक ही झटके में तबाह कर दी जाएंगी!!! क्या हजारों हंसते खेलते परिवारों के दीपक, दंगे की आग में झोंक दिए जाएंगे। क्या यही है हमारी नई पीढ़ी??? बुद्धिहीन चेतनाशून्य!!!! जिनके कंधों... »

अर्धनारीश्वर

हे शिव! स्त्रियों की मन स्थिति जानने को पार्वती संग. … अर्धनारीश्वर रूप रखा होगा। इस रूप में आने के बाद आपने खुद ही एहसास किया होगा। जीवन गाड़ी के दो पहियों के समान है, जीवनसंगिनी को साथ में लेकर चलना सफल जीवन की पहचान है। जीवनसंगिनी के साथ पग पग पर, आपने भी तो विष पिया होगा। विष कंठ से नीचे नहीं उतार पाए ना, कंठ नीला पड़ गया और पार्वती उनका क्या? बोले गए हर कटु शब्द के विष को हंसते-हंसते पी... »

है शिव शम्भू!

जय शिव शंभू कृपा करो, गलतियां सभी की क्षमा करो। भोलेनाथ तुम कृपासिंधु हो, दया के सागर कृपा करो। ध्यान मग्न तुम हरदम रहते, भक्त हमेशा रहते घेरे। ध्यान में रहकर ध्यान हो रखते हैं, भवसागर से पार तुम करते। सभी जनों का रखते ध्यान, तुम मेरे आराध्य देव दीप्तिमान। निमिषा सिंघल »

तुम्हे बहुत याद करते हैं

युग बीता बातें याद बन गई, लिखते – लिखते ….. तुम एक किताब बन गई। रचनाओं में रोने की हंसने की गढ़ावत है तुम्हारे साथ हर पल दुबारा जीने की लिखावट है। किताब के बहाने तुम्हें याद करते है, ए अजनबी हसीना तुम्हें बहुत प्यार करते हैं। निमिषा सिंघल »

होली

होली —— रंग भरे ख्वाब से, हाथ में गुलाल है। श्याम रंग में भीगने को राधा बेकरार है। नटखट कान्हा तेरी बांसुरी से प्यार है। बांसुरी के स्वरों में प्रेम का मनुहार है। फूलों की डोली , रंगो की होली। कितनी मधुर लागे कान्हा प्रेम की बोली। हाथ में गुलाल है, मुख शर्म से लाल है। बोलियां बतिया तेरी , बड़ी मजेदार है। रसिक बड़ा छलिया है, कान्हा तू मन बसिया है। तेरे रंग में रंग गई में, आज तो राधेकृष्... »

मुस्कुराहटें

मुस्कुराहटें बेहद कीमती हैं, रोके ना गवाओं यूं ही। आंसुओं को छोड़ो.. रोते-रोते भी हंस जाओ कभी। जिंदगी दुखों का सागर है, सागर से प्रेम और हंसी के मोती भी ढूंढ लाओ कभी। अकेले-अकेले ना जिओ, कभी तो सबके संग भी खिल खिलाओ यूहीं। जिंदगी का क्या है! आती जाती रहेगी। प्यार से बिताए पलों की छाप छोड़ जाओ कभी। करोड़ों लोग इस संसार में, जीते हैं सिर्फ अपने लिए। कभी किसी की हंसी के लिए, कुछ करके दिखाओ यूं ही। तु... »

सच्चा मित्र

बैरी नहीं वो होता, जो आईना दिखाता। एक सच्चा मित्र ही तो, गलतियां बताता। जब मित्र गलती पर हो, दे घर से वो निकाला, कोई हल बिना निकाले, परिवार ही हिला दे। फिर पूछता फिरे सभी से, क्यू बैरी जग ये सारा । खुद ही जवाब होकर, मांगे जवाब खुदाया। तब मित्र का कर्तव्य, सही मार्ग है सुझाना। परिवार होता जिनका… अकेले,बिना पूछे ,कोई फैसला नहीं सुनाता। तब मित्र सोचते हैं, अब आईना दिखाना, थोड़ा सबक सिखाना अब हो... »

धरती और दरख़्त

धरती और दरख़्त ———————- तेज आंधी से झुका वह विशाल दरख़्त, धरती को बांहों में भरने को आतुर था। धरती देख झुकाव मतवाली थी प्रेम वर्षा को वो भी तो आतुर थी। तपती देह पर पत्तो की छाया ज्यो की, असीम सुख पाने धरती नवयौवना बनी । अभी तक सींचती थी धरती दरख़्त , आज दरख़्त बादलों से पत्तों में जल लाया था। आज बरसने की बारी दरख्त की थी। तृप्त होने आज धरा आई थी। दरख़्त मो... »

सृजन और विनाश

सृजन और विनाश ———————– आदि शक्ति ने किया हम सब का सृजन, हम विध्वंस की ओर क्यों मुड़ते गए? हरी-भरी सुंदर थी वसुंधरा, उसे राख के ढेर में बदलते गए। धरती ने दिया बहुत कुछ था हमें, हम पाते गए नष्ट करते गए। इस स्वस्थ सुंदर धरा को हम, क्षतिग्रस्त ,रोग ग्रस्त करते गए। खाद्य पदार्थ परिपूर्ण थे यहां, लालसा दिन-रात बढ़ाते रहे। हरे-भरे दरख़्तों को काटा गया, धरती... »

सृजन और विनाश

सृजन और विनाश ———————– आदि शक्ति ने किया हम सब का सृजन, हम विध्वंस की ओर क्यों मुड़ते गए? हरी-भरी सुंदर थी वसुंधरा, उसे राख के ढेर में बदलते गए। धरती ने दिया बहुत कुछ था हमें, हम पाते गए नष्ट करते गए। इस स्वस्थ सुंदर धरा को हम, क्षतिग्रस्त ,रोग ग्रस्त करते गए। खाद्य पदार्थ परिपूर्ण थे यहां, लालसा दिन-रात बढ़ाते रहे। हरे-भरे दरख़्तों को काटा गया, धरती... »

सिंड्रेला

प्रेम की वैतरणी में बहना तुम्हारे साथ, एक अद्भुत एहसास। जान डाल दी हो जैसे मिट्टी की गुड़िया में किसी जादूगर ने, बना दिया उसे सिंड्रेला फिर एक बार। निमिषा सिंघल »

छलिया

जल कुकड़े हो क्या! गुम हो जाते हो भाप से। या सूखी धरती जिसे तलाश है बरखा की। या फिर भवरे हो,। जिसे फूल फूल मंडराना पसंद है पर जो भी हो हो तुम छलिया, जिसे पसंद है घोंसला अपना ही। निमिषा सिंघल »

होली

हमें नहीं पता तुम्हें नहीं पता, तू क्यों है लापता खुशनुमा लम्हा। क्यों सूख रहा है वह हरा दरख़्त, किसे मिलकर सींचा था पहली दफा। वो यादें गुमसुम है जहा बोली थी हमने प्यार की बोली, उस फिजा की रंगत उड़ी-उड़ी जा खेली थी रंगरेजिया तेरे संग होली। निमिषा सिंघल »

तस्वीर

जीवन की कड़वी सच्चाई एक माला चढ़ी तस्वीर में छिपी है कुछ समय पश्चात हो तस्वीर भी नहीं रहेगी। याद का क्या है याद तो आती जाती रहेगी, धूमिल हो जाएगी दूर जाती रेलगाड़ी की तरह। इस जग में अमर रहने के लिए, कुछ अच्छे कर्म जरूरी है। जो आपको जिंदा रखेंगे युगों युगों तक आपको सिर्फ तस्वीर नहीं बनना यह याद रहे। निमिषा सिंघल »

तुम्हारे इश्क़ में

झूठ बोलना प्यार में तुम्हारा, जैसी पूर्ण अधिकार था तुम्हारा। आंखों में तुम्हारे झूठ को पढ़ते चले गए, हंसते-हंसते तुम्हारे इश्क में फंसते चले गए। हठधर्मिता तुम्हारी स्वामित्वतता तुम्हारी, स्वीकारते गए, हर बात से तुम्हें मतलब हर चीज में दखल था, आगोश में तुम्हारी खुद को मिटाते चले गए हंसते-हंसते तुम्हारे इश्क में फंसते चले गए। निमिषा सिंघल »

मुखोटे

जीत हार चलते रहते, लोग चेहरे बदलते रहते। मुखोटे लगाकर मिलते एक दूसरे से, बगल में छुरियां दबाए रखते। निमिषा सिंघल »

हर रास्ता वहीं पे जाता

क्यों ना! क्षितिज के पार ….जाल डाल…. खींच ले वह आलौकिक नजारा, जहां बसे ग्रह नक्षत्रों का खेल …..बना देता हम सबको बेचारा। जब चाहा जिसे चाहा एक झटके में वो काटा!! डोर जिससे बंधा था हर जीव … जीव से परमात्मा। ना उम्र का तकाजा ना बीमारी का ठिकाना, हंसता खेलता इंसान भी हो जाता प्रभु को प्यारा। फिर किस लिए बनावट फिर किस लिए दिखावा, सीधा हो या जटिल हो, हर रस्ता वही पे जाता। निमिषा ... »

कान्हा की मीरा

सघन बादल तुम….. मै धरती, प्रेम सुधा पीने को तरसी। उन्मुक्त प्रेम का हनन ना कर, हे घन! अब बरस, दुर्दशा ना कर। प्रेम आचमन करा दे मुझको, सुधा में नहला दे मुझको, प्रेम पाश में बंधी है मै, सीढ़ी दर सी चढ़ी हूं में। आकाश में चांद को छूना है, कान्हा की मीरा बनना है। निमिषा सिंघल »

ढोंगी बाबाओं की लीला

ढोंगी बाबा ————- पैसा, संतान, विवाह, घर- मकान, इन्हीं बातों का जाल डाल लोगों को भरमाते हैं। हां! कुछ शातिर लुटेरे चोगा पहन.. ढोंग खूब रचाते हैं। सीधे साधे लोगों का शोषण कर जाते हैं, दीक्षा के नाम पर बेटियों को बहकाते हैं, शारीरिक शोषण कर हत्या फिर करवाते हैं। हां! यह ढोंगी हत्यारे बन जाते हैं। साधुत्व के अंशमात्र को छू भी नहीं पाते हैं छोटे मोटे जादू सीख परमात्मा बनना चाहते... »

पति और पत्नी

थोड़ी सी दिल्लगी, थोड़ा सा प्यार। थोड़ा सा गुस्सा, ज्यादा ऐतबार। ताज़गी, समर्पण आकर्षण हथियार। एक दूजे को बांधे रहे, गलबहियों के हार। रूठना,मनाना इनसे जीवन खुशगवार। नीरसता कर देती, जीवन बेकार। एक दूसरे के कहे बिना समझना यही है प्यार जो जान ना सके दिल की बात तो ऐसा रिश्ता है बेकार। कुछ वो कहे,कुछ हम सुने, कुछ हम कहें, कुछ वो सुने। तब ही सफल होती है गठबंधन सरकार। तुम महाराज और हम महारानी, खट्टी ,मिट... »

दुख के आगे सुख

हंसना मुस्कुराना ना तू दुख मनाना, हर दुख के बाद सूख है जरूर ये मन को है समझाना। अंधेरों के आगे रोशनी का साया है, रब ने दुख सुख से यह जीवन सजाया है। हंस ना सके इस जीवन में तो सुखसुविधा बेकार की हैं, यदि गम में डूब कर हार गए तो हिम्मत फिर किस काम की है जीवन की नाव में बैठे हो तूफ़ानों को झेलना होगा, मंज़िल खुद मिलने आएगी यदि डर कर पीछे लौटे ना। निमिषा सिंघल »

कल का भरोसा क्या कीजे

जिंदगी का भरोसा क्या कीजे, सांसो का भरोसा क्या कीजे, जो आज है सच तो है सिर्फ वही, आने वाले कल का भरोसा क्या कीजे। निमिषा सिंघल »

वज्रस्त्री

पंख काट जाल डाल .. धरती से ऊंचा ना उड़ने दिया, पुरुष महासत्ता का शिकार .. स्त्री को होना पड़ा। सुष्मिता थी वह स्त्री कुसुम, वज्र स्त्री होना पड़ा, स्वाभिमानी को अस्मिता कहा, बैरागन बनना पड़ा। इंद्रधनुषी संसार था उसका, कोरा कैनवास होना पड़ा। बंधन और मुक्ति के दरमियां, प्रेम को संघर्षरत रहना पड़ा। पुरुषत्व के आगे झुकते झुकते, उसको पत्थर होना ही पड़ा, उसको पत्थर होना ही पड़ा। निमिषा सिंघल »

जीवन उपहार

जीवन उपहार ——————- कभी खुरचते कभी लेप लगाते, कभी शीतल वाणी, कभी आंखों में पानी। कभी मौन धारक ,कभी गुनगुनाते। कभी प्यार बर्षा,कभी भुनभुनाते। कभी गलती करते ,कभी बनते सुधारक। कभी सुन्न मस्तिष्क, कभी बन जाते विचारक। कभी बच्चों जैसे कूदकते – फुदकते, कभी बूढ़ों जैसे इशारे चलाते । कभी बातें मिश्री कभी थी कंटीली, उमर ऐसे बीती, जैसे कोई पहेली। समय सारणी में छपी रही... »

वतन को सिला फिर खूब दिया

दिलों को जोड़ा ना गया, फैला दी मुल्क में खलिश। सुख चैन लूट कर,आतंकियों ने लगा दी आतिश। 1. धर्म के ठेकेदारों ने धर्म के नाम की बांटी बक्शीश, मासूम सी जानों को खून खराबे और द्वेष की देदी दानिश। 2.प्यार बांटा ना गया नफरत की रखी ख्वाहिश, फूल तो तोड़ दिए कांटों की कर रहे परवरिश। 3. खाया जिस थाली में छेदा उसी को ये उनकी जुंबिश, वतन ने अपनाया, प्यार जताया , उसी से की रंजिश! 5. शांति और चैनो अमन मुल्क से ... »

नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थन में

नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थन में ————————————— हम वतन थे जो त्रस्त थे बाहर, उनको घर उनके बुलाया तो बुरा क्या किया! बिना टिकट सवार थे भारी टिकट जो पूछी गई ऐसा बुरा क्या किया! सांप बिच्छू सभी रहते थे जहां बिलों में पिघला शीशा डाला तो बुरा क्या किया! दीमकें लगी थी जड़ में खोखला वतन ये किया जड़ों में तेल लगाया तो बुरा क... »

कौन हूं मैं?

कौन हूं मैं? ————- बिजलियां, आंधियां कोंधती उड़ती रहीं। धारियां, छुरियां दिल पे निशा देती रहीं। अठखेलियां, रंगरेलियां आवारगी करती रहीं। विरक्तिया,सिसकियां गम और ख़ुशी भरती रहीं। रीतियां, बेड़ियां बंदिशे देती रहीं। गलबहियां, कनअखियां सुकुन है कहती रहीं। इश्क़ में कुछ तो बात थी कचहरीयां होने लगी मुश्क सा वो फैल गया हर गली चर्चा होने लगी। दिल की लगी भी थी क्या लगी सदियों तलक स... »

कुफ्र

अतीत के फफोले तेजाबी बारिश दहकते लावे की तपिश या कोई आतिश ताउम्र का सबक बस एक कुफ्र। निमिषा »

तट बंदिनी

तटबंदिनी ———— तटबंदिनी सी मै सागर से तुम। बंधन सारे मेरे लिए! आज़ाद परिंदे तुम। निमिषा »

पिया बिना

पिया बिना ——- सुनो प्रिय! मेरा हृदय करे स्पंदन आंखों से फैला ये अंजन भूख प्यास सब लगते झूठे पिया बसंती तुम जो रूठे। सूखे पत्ते सी में कांपू तेरे बिना शापित सी नाचू पल पल तेरी राह निहारु द्रवित हृदय से तुझे पुकारू। मरुभूमि सी तपती देह प्रेम सुधा बरसादे मेंह तेरे दरस की प्यासी हूं बिन तेरे महज उदासी हूं। अंजुरी भर-भर पीना है हो प्रेम बाबरी जीना है इस जग में प्रेम का चलन यही बिन पिया किसी... »

वो खिलोनवाली

वो खिलौने वाली ——————— एक पैर से लाचार वो स्वाभिमानी लड़की, याद है मुझे आज भी कल ही की बात सी। चेहरा नहीं भूलता उसका तीखी खूबसरत सी नाक थी। रूखे सूखे से बाल तन से वो फटे हाल थी। चेहरे पर उसके जीने की चमक , कांधे पे झिंगोला लिए लाठी के साथ थी। हां वो खूबसूरत लड़की बड़ी बेमिसाल थी। गाड़ीयों के बीच में सड़कों पर दौड़ती, एक लाठी के सहारे, खिलौने वो बेचती। गर्म... »

गज़ल

गज़ल ——- जहर यह उम्र भर का एक पल में पी लिया हमने। तुम्हारे साथ जन्मो जन्म रिश्ता जी लिया हमने। 1.मुकम्मल ना हुआ तो क्या इश्क को जी लिया हमने कहते हैं आग का दरिया डूब कर देख लिया हमने। 2.चिरागों की जरूरत क्या पड़ेगी हमको ए कातिल, जलाकर खुद का दिल ही आज कर ली रोशनी हमने। 3. तुम्हारे बक्शे जख्मों को हरा रखना …. आदत बना ली है जो गहरे घाव है दिल के सजा कर रख लिए हमने। 4.सितमगर इश्क़ ... »

किताबे

किताबें ——– किताबे गुमसुम रहती हैं आवाज़ नहीं करती। सुनाती सब कुछ है लेकिन बड़ी खामोश होती है। छुपा लेती है सब कुछ बस, घुटन वो खुद ही सहती हैं। दफन कर लेती बेचैनी, दुख वो खुद ही सहती हैं। लोग जो कह नहीं पाते, किताबों में वो लिख जाते। खुद तो निश्चिंत हो जाते, किताबों को वो भर जाते। अगर कोई झांकना चाहे किताबें आईना बनती। अगर कोई देखना चाहे अक्स हर शख्स का बनती। हृदय का बोझ ढोती है ... »

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