NIMISHA SINGHAL's Posts

तुम्हें आना पड़ेगा

तुम्हें भारी पड़ेगा तैरना ऊपर सतह पर, रत्न मिलते नहीं भटकन वहां पर। रत्न मिलते हैं गहराइयों में, तुम्हे आना पड़ेगा, ह्रदयतल में उतरकर। »

एक कवि का जाना

एक कवि का जाना ———————— एक कवि अपनी दूर दृष्टि और लेखनी से पूरे संसार का दुख सुख समेट बिखेर देता है सुंदरता से कागजों पर कीमती मोतियों की तरह, इनकी चमक से मिलती है कुछ भटके पथिकों को राहें कुछ दुखती रगो को शांति, किसी उल्लासित मन को प्रेम। किसी अधूरे से हृदय को अपनी सी कहानी, किसी दुखी मन को संतोष, किसी अधीर मन को धैर्य। सभी को उनके हिस्से का कुछ ना ... »

जिंदगी एक किताब

“जिंदगी एक किताब है, सारे हर्फ न पढ़ पाएगा‌ दुख सुख है बदलाव है, बढ़ता चल.. वरना उलझ कर रह जायेगा।” निमिषा सिंघल »

पूस की रात

पूस की रात ————- कड़कड़ाती सर्दी,सिसकती सी रात ठिठुरन, सिहरन आरंपार। पूस की रात जो हुई बरसात कांप उठी सारी कायनात। ना जाने कब होगी ये प्रातः। ठंड और कोहरे ने गला दिए हाड़ मांस। खून जम चुका है प्रभु से लगी है आस। कांप रहे जन जिनका नहीं है बसेरा कही। शीत से बचने को चिथडो में लिपटे कुछ प्राण है। शीत का प्रकोप जारी ठंड है या कोई महामारी जान पे बनी है कायनात पर पड़ी हैं भारी। एक... »

हरसिंगार

हरसिंगार ———– रात भर महकता, संवरता करता इंतजार, तड़प कर बिखर जाता धरा पर …. होकर बेकरार। खिल जाती धरा, मुस्कुराकर कहती आओ केसरिया बालम हरसिंगार! »

जिंदगी

जिंदगी ——— हर किसी को खुश रख सके… यह तो भगवान के भी बस की बात नहीं। किसी के लिए अच्छे हैं तो किसी के लिए बहुत बुरे भी। तो हार जीत से डरना कैसा! कोई क्या कहेगा घबराना कैसा! जिंदगी बदलाव है ठहराव नहीं, जिंदगी बहुत खूबसूरत है केवल युद्ध का मैदान नहीं। निमिषा सिंघल »

तृप्ति

तृप्ति —— वाग्देवी सरस्वती लड़खड़ाती जब निकलती हैं पहली बार बोलते किसी बालक के स्वर से… तो रसिक की तरह निहाल हो जाते हैं हम सब। वह पहला मधुर स्वर सुनने को लालायित, हमारे कान और नन्हे बालक के सुकोमल अधरों पर फूटते स्वर… सूर्य की किरणों के सामान उल्लासित करते हैं सभी को। उस तुतलाती भाषा में ढूंढ लेते हैं स्वयं ही हम, खुद के लिए बोला जाने वाला संबोधन और चहक कर चूम लेते हैं पुष... »

शोर

अनर्गल पक्षियों की चहचहाहट हमें शोर महसूस होती है जिस ध्वनि को सुनना हमारा मन गंवाया न करें वे सभी शोर हैं »

शरद ऋतु का आगाज

शरद ऋतु का आगाज़ —————————- लंबी हो चली रात , कोहरा और बरसात। ऐसे में तेरा साथ, रूमानी एहसास। गुलाबी होठों के खुलते ही गर्म सांसों की आवाज़। कोहरे की चादर ओढ़े सूरज की तबीयत नासाज। यह है शरद ऋतु का आगाज़। निमिषा सिंघल »

थोड़ा सा कुछ

थोड़ा सा कुछ —————— घर एक कारखाना, काम करते-करते.. थोड़ा सा कुछ रह ही जाता है। तन- मन से बढ़िया से बढ़िया करने के बाद, मुस्कुराहट के साथ परिवारी जनों की प्रतिक्रिया जानने के लिए जब परसे जाते हैं व्यंजन, एक तकिया कलाम मिल ही जाता है,। “बहुत उम्दा बना है अगर इसमें थोड़ा सा……” निमिषा सिंघल »

गुनगुनी धूप

वह गुनगुनी धूप सी तेरी हंसी, मानो गुलाब की पंखुड़ियां एक साथ झड़ी। मधुर अधर सकुचाये से शरमाये से बेकरार दिल ये उड़ा जाए रे। निमिषा »

बेकरार दिल

एक झलक और मुस्कुराहट तुम्हारी, देती रहें खुशियां.. न हो युद्ध की तैयारी। धड़कनें राग बजाती रहें, अभी जिंदा है हम… यह जताती रहे। रौंनके बरकरार रहे, क्या बात हो अगर .. ता उम्र .. तेरे प्यार में हम … बेकरार रहें। निमिषा सिंघल »

लम्हे

लम्हें —– कुछ गहरे घाव से दुखते होंगे, कुछ गहरे तंज जो आज भी चुभते होंगे। कुछ वक्त के मरहम से भर चुके होंगे, कुछ सुगंधित फूल से महकते होंगे। कुछ लम्हें तोहमतें, कुछ तोहफों से जंचते होंगे। कुछ लम्हें ख्वाबों के उड़ानों के, कटे पंखों से भी उड़ते होंगे। कुछ लम्हें बंजारे तो कुछ बेहद दिलकश लगते होंगे। ‌ खट्टी-मीठी सी जिंदगी के सारे पन्ने, कभी कड़वे तो कभी रसीले लगते होंगे। चलो कुछ कड़वापन ... »

पुनर्स्थापना

पुनर्स्थापना ————- गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक और राजा राममोहन राय नहीं जानते होंगे की कुप्रथा पर रोक लगाने के बाद भी…. वे नहीं रोक पायेंगे उन्हे। बस चोला बदल पुनर्स्थापित कर दी जाएंगी अलग-अलग सदी के आकाओं के हिसाब से। स्त्रियां अनवांटेड और मोस्ट वांटेड के बीच झूला झूलती रह जायेंगी। आकांक्षाएं बाज के पंखों सी अनंत आकाश की गोद में फैलती सिकुड़ती रहेंगी। ढोल नगाड़ों... »

सफलता

सफलता ———– बुझ रहे हो दीयें सारे, ओट कर.. जलाए रखना। जल विहीन भूमि से भी, तुम…. निकाल लोगे जल.. विश्वास को बनाए रखना। अंधकार व्याप्त हो.. सूर्य की तलाश हो, मार्ग जुगनूओं की रोशनी से तुम सजाए रखना। मुश्किलें मिले अगर, डर के लौटना न तुम.. आत्मविश्वास की चमक चेहरे पर खिलाए रखना। मान को बनाए रखना, सम्मान को बचाए रखना। रच दो इतिहास , ऐसा परचम फहराये रखना ज्ञान की मशाल से र... »

ऊर्जा स्रोत

ऊर्जा स्रोत ————- प्रिय! विद्युत सी है वाणी.. चल पड़ती है तो कानों में घुल… रूपांतरित हो जाती है मेरी हंसी और क्रोध में अनायास। याद दिला ही देते हो तुम “जूलियस रॉबर्ट मेयर”की… ऊर्जा के कभी नष्ट ना हो पाने के नियम के साथ। कभी-कभी बादलों सा हो जाता है हृदय… भरभरा कर फट पड़ता है, चमकने लगती है कई तरह की बिजलियां… आंखों, चेहरे, जुबां और नाक क... »

दस्तावेज

दस्तावेज ———– दबे पांव तृष्णायें घेर लेती है एकांत पा, विचारों की बंदिनी बन असहाय हो जाती है चेतना। अवचेतन मन घुमड़ने लगता है बादल बन, लहलहाने लगती है विचारों की फसल। ऋतु परिवर्तित हो..बसंती हवा से भिगोने लगती है मन। मन के किसी कोने में बहुमूल्य दस्तावेजों के पन्ने खुलने लगते हैं एक- एक कर, संवेदनाएं घेर लेती हैं। धावों से रिसने लगता है लहू। फिर शब्दों का मरहम शांत कर देता ... »

जिंदगी रुक नहीं सकती

जिंदगी प्रतिक्षण अंतिम पड़ाव की ओर कदम बढ़ाती है इस सच को हम भूलना चाहते हैं पर किसी न किसी की मौत हमें यह सच बार-बार दिखाती हैं मृत्यु का डर बार-बार हमें अच्छे बुरे कर्मों की तस्वीर दिखाता है मौत समझाती है अटल हूं मैं प्यार से मिलजुल चाहत के फूल खिलाए रखिए प्रेम, मोह, स्नेह मृत्यु के आगोश में विलीन हो जाता है, जिंदगी रुक नहीं सकती किसी के जाने से। »

बनाए रखिए

ज़ुबान तेज हो तो शूल सी चुभती है बहुत चुभन के दर्द से लोगों को बचाए रखिये। जिंदगी ठहरी है न ठहरेगी कभी, प्यार के दीप, फिजाओं में जलाए रखिए। मौत आगोश में ले लेगी सभी को एकदिन, यह हकीकत है मगर मगर दिल में छुपाए रखिए। चैन मिलता नहीं आसानी से, बैचेनियां बेच कर कुछ चैन बचाए रखिए। प्रेम से मिलते रहा कीजिए एक दूसरे से, क्या पता मौका, मुलाकात कभी हो के न हो। चाहते बरकरार रहे अलविदा कहने पर भी, संबंधो में ... »

क्षणिका

ज्ञान का घेरा, मज़हब का अंधेरा। अतंर! शांति और युद्ध जितना। निमिषा »

अनमोल रचनाएं

कवि की अकुलाहट बोल रही, बिन लिखे कलम दम तोड़ रही। रचनाएं हैं अनमोल सभी, सिक्कों से इनकी तोल नहीं। निमिषा »

कवि

मौन रही गर कलम कवि की, दम उसका घुट जाएगा। चेहरे से जिंदा दिखता हो, अंदर,भीतर मर जायेगा। निमिषा »

जानवर

क्रूर व्यवहार अच्छे खासे इंसान को भी कहलवा देता है “जानवर कहीं का”। इंसान का जन्म है इंसान ही रहिए जानवर बनने की कोशिश न करिए। निमिषा »

मृगमरीचिका

मृगमरिचिका मृगतृष्णा यह जीवन सारा तृष्णा में डूबा जाता है, तृष्णाग्रस्त हो खोया रहता है, हाथ नहीं कुछ आता है। मरुभूमि में उज्जवल जल सा… बार-बार बहकाता है। कस्तूरी की तरह दिशाविहीन हो भटका- भटका जाता है। रेत खार की परतों पर सूर्य, चंद्र जब प्रकाश बरसाता है, लगता जैसे भरा जलाशय पास जाओ तो अदृश्य हो जाता है। दीपक तले पतंगा फिर फिर -फिर, आकर्षित हो जाता है। अपने पंख जलाकर औंधे मुंह धरती पर आता ह... »

महफिल

महफिल ———- महफिल में हंसते चेहरे भी. … अक्सर बेचैन से रहते हैं, वह हंसते-हंसते जीते हैं आंसुओं को भीतर पीते हैं। महफिल में रौनक छा जाती … जब प्रेम के नग्मे बजते हैं, कुछ यादों में खोए रहते हैं कुछ गमों को पीते रहते हैं। आबाद हो महफिल कितनी भी.. मन में वीरानी रहती है, लोगों के बीच में रहकर भी, यादें आती जाती रहती हैं। यह नशा बहुत ही जालिम है… बर्बाद ये दिल को करत... »

बाबुल

बाबुल —————- ‌‌ याद आए बाबुल जब-जब तेरी, आंख भर आए तब तब मेरी। मैं चिड़िया थी अंगना तेरे, चहका करती सांझ सवेरे। गोद में हंसती रोती गाती, थपकी तेरी मुझे सुलाती। थी बाबुल तेरी शहजादी याद तेरी आ आके रूलाती। याद आए बाबुल जब-जब तेरी, आंख भर आए तब तब मेरी। 2. आती है जब याद तिहारी भर जाती आंखों की प्याली। आंखों में तस्वीर घूमती, बाहों में तेरी मैं झूलती मन को मेरे बहुत सताती... »

मधुमक्खियां

मधुमक्खियां —————- कालबेलिया नृत्यांगना सी रंगत…. छरहरी… बिजली सी फुर्तीली, योद्धा ….. डंक हथियार लिए… घुमंतू… चकरी सा नृत्य कर जब तेज स्वर में बजाती है सारंगी सी धुन… तो मादकता बिखर जाती है हवाओं में, फूल डूब जाते हैं वाद्ययंत्रों सी मधुर आवाज में.. उन्हें मग्न देख.. चुपचाप किसी चिकित्सक की भांति इंजेक्शन रूपी सूंड़ से खींच लेती है... »

गूंगी लड़की

गूंगी लड़की ————— रात्रि के अंधकार में, नहा जाती वह दूधिया प्रकाश से। जब उसकी कहानी के पसंदीदा किरदार उसको घेरे खड़े होते। बेबाकी से वो दिखा देती अपने दिल में उठे ज्वारभाटो के निशान कह देती वो बात जो शायद जुबां से ना कह पाती। हृदय के बंद कमरे में बजते संगीत से उठती स्वर लहरियां छिड़ते तार। अंदर था कोलाहल बाहर मौन। गूंगी लड़की के समान थी y जो सिर्फ इशारों में ही बात सम... »

किन्नर

किन्नर ——– व्यंगात्मक हंसी में भी प्रेम तलाशते, अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर यह संवेदनाओ से भरे हृदय अपनी दो जून की रोटी के लिए आपके घर खुशियों के मौकों पर भर भर झोली दुआएं दे जाते हैं। बदनसीबी की रेखाएं हाथ में लेकर पैदा हुए ये इंसान…. मां बाप के दुलार के लिए तड़पते ही रह जाते हैं। जिन की दुआएं औरों के लिए आसमानों में क़ुबूल की जाती है… अपने लिए दुआओं के नाम पर इनकी झो... »

दायरे

किन्नर ——– व्यंगात्मक हंसी में भी प्रेम तलाशते, अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर यह संवेदनाओ से भरे हृदय अपनी दो जून की रोटी के लिए आपके घर खुशियों के मौकों पर भर भर झोली दुआएं दे जाते हैं। बदनसीबी की रेखाएं हाथ में लेकर पैदा हुए ये इंसान…. मां बाप के दुलार के लिए तड़पते ही रह जाते हैं। जिन की दुआएं औरों के लिए आसमानों में क़ुबूल की जाती है… अपने लिए दुआओं के नाम पर इनकी झो... »

तलवार अब जरूरी

तलवार जरूरी —————— मराठे, राजपूत, सिख सदा उसूलों पर ही चले थे। सीने पर तीर खाएं…. फिर भी… पीठ पीछे ना वार किए थे। अंग्रेज या मुगल हो इनसे …. धोखे पर धोखे खाए। हाथ दोस्ती के थामे.. पीठ पर हमेशा खंजर खाये। इतिहास को पलट लो दर्पण है आज का भी। पीठ पीछे वार सहना… नियति है आज की भी। सीमा पर हाल देखो! वीर रक्षक वहां अड़े हैं। दुश्मन धोखा देने को... »

वायरस

वायरस ——– वायरस हो क्या! जो लहू में संक्रमण की तरह फैलते ही जा रहे हो। या फिर परिमल जिस की सुगंध खींच लेती है अपनी ओर। या व्योम में अंतर्ध्यान शिव जो जग को मोहित कर लीन है तपस्या में। या फिर सूरज जिसकी ऊर्जा से जीवन पाता है यह संसार। या फिर विशाल गहरे सागर हो तुम जो हर अच्छाई बुराई को अपने अंदर समा लेते हो कुछ नहीं कहते। या वैद्य हो जो प्रेम में पनपी व्याधियों को ठीक कर देता है। ... »

दायरे

दायरे ____ **** दायरे थे ही नहीं मानव की लालसा के! हर तरफ फैलाव था पैर पसारे। जीव सीमट रहे थे दायरो में…. लुप्त और लुप्तप्राय होते जीव सिर्फ किताबो में छपी तस्वीर बनते जा रहे थे। बंजर होती धरती …. सिमटते वनस्थल…. त्राहिमाम की कर्कश ध्वनि …. जीवो का हाहाकार…. कानों को भेदता, मानव का क्रूरतम अट्टहास। बेलगाम मानवता… दिखावटी जीवन ….. आधुनिक बनते हम। लहूलुहान ध... »

ये समय फिर ना मिले दुबारा

यह समय फिर ना मिले —————————- “दौड़ भाग की जिंदगी सुकून छीन ले गई, हम दौड़ते ही रह गए जिंदगी पीछे रह गई।” वक्त फिर भी ना रुका, सबको ठहरा सा दिया। भागी दौड़ी सी थी जो, बेबसी से वो थमी। जो कभी रुकी ना थी, ठहर गई यहीं कहीं। ऐसा तो हुआ ना कभी, जैसा हुआ इस बार अभी। विश्व संकट में पड़ा, डर से बुरा हाल हुआ। मौत का शिकंजा देखा, आंखों देखा ह... »

महामारी से मुक्ति प्रार्थना

महामारी से मुक्ति प्रार्थना —————————— हे दुख भंजन दयानिधे कृपासिंधु . .. भव पार करें। करो कृपा हम दीनजनों पर, दूर करो सब कष्ट धरा पर। करे तपस्या सब जन घर पर, बंद पड़े प्रभु द्वार धरा पर। मुक्ति दे दो कष्ट हरो सब खत्म करो यह महादानव अब। छिन गई खुशियां बंद हैं हंसी डर हैभीतर, सहम गए सभी भूख प्यास सब हो गयाआधा, विचलित मन जाए ना साधा। अब तो ... »

मापदंड

मापदंड ———- कुंठित हृदय से उपजती विषाक्त बेल, लील जाती है कितनी ही हरी कोपले। उनको कुचलती कोपलों से निकली, दर्दनाक चीखों का शोर दब जाता है फाइलों तले। उस हत्या के साथ पूरे परिवार की ही मौत हो जाती है। नहीं देख पाती हैवानियत….. इस कठोरता को। मानसिक दंश झेलते रोते बिलखते परिवार, और उनकी दुर्दशा को भुनाते अपनी टीआरपी बढ़ाते न्यूज़ चैनल्स … इंसान की संवेदनाओं की न्यूनता क... »

ग़ज़ल

ग़ज़ल ——- दूरियां ,नज़दीकियां, खुशफहमियां तेरे साथ में, हम मिले ना थे कभी पर बह गए जज्बात में। 1. मौसमै अंदाज था कुछ खास था उस रात में, थे गिरफ्त में इश्क के उस बेवजह सी बात में। थी नहीं मंजूर हद …इश्क की बरसात में, दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में…… 2. जब्बे सैलाबे मोहब्बत ले रहा उफान था, धड़कने बेकाबू थी दिल में अजब तूफ़ान था। तेरी आहट देती थी बस.. दिल को थ... »

शिखर

शिखर धरा, गगन, मृदुल पवन हिले तेरी एक हूंक से, जो तू चले बिना रुके मंजिलें दिखे तुझे। समुंद्र भी दे रास्ता जो तू कहे जब गूंज से, चमकीला हो ये आसमान पसीने की तेरी बूंद से। संगीतमय सारा जहां स्वागत करें भीना पवन, धरती भरे अभिमान की हुंकार तुझे देखकर। हिम्मत है गर आगे निकल तू जीत ले सारा जहां, तेरी चमक से रोशन जहां पाले जो खुद से तू शिखर। निमिषा सिंघल »

युवा पीढ़ी

युवा पीढ़ी रचो इतिहास लिखो शौर्य की अद्भुत कहानी देश को भय मुक्त करो। भ्रष्टाचार, दुर्दभ्य दानवता के खिलाफ नए युग का सृजन करो। आओ युवा पीढ़ी! नारियों को अत्याचारों से मुक्त करो। हे राष्ट्र के कर्णधारों! देश को नई ऊर्जा उन्नति देकर नवराष्ट्र का सृजन करो । निमिषा सिंघल »

उम्मीद

उम्मीद की किरण जगमग आई है, आज फिर याद मुझे तेरी ओर लाई है। जमाने की तपिश, जिम्मेदारियों का बोझ.. सहते -सहते दबी राख सुगबुगाई है। तपती मनस्थली पर स्नेह की बूंदे छलकी, सूखी धरती पर बदली छाई है। फिर एक उम्मीद मुझे तेरी और लाई है। झंझावात तूफानों से घिरी थी जिंदगी, प्रेम रस में नहाने आई है। आज फिर उम्मीद मुझे तेरी ओर लाई है। दिखावटी, अनमनी, अजनबी सी थी कुछ, जिंदगी फिर से मुस्कुराई है। फिर एक उम्मीद मु... »

दिया

सुनो! तुम सागर की तरह क्यों लगते हो? शब्दों में गहराई बहुत है मानसिक द्वंद छिपाने में चतुराई बहुत है। बाहर से एक शांत सतह भीतर गहरे तूफ़ान से लगते हो। प्रेम में हारे हुए लडको की तरह विरह और लौट आने की उम्मीद की शायरी लिखते लिखते ना जाने कब जिंदगी से कुछ मांगना भी छोड बस बहते जा रहे हो बहाव के संग। जिंदगी से आक्रोश पुराना लगता है कहीं बहुत दूर रोशन दिए की तपिश और ऑक्सीजन डालती रहती है जान एक बेजान ... »

बहन

एक एक चीज का गिन गिन कर हिसाब लेने वाली वो लड़ाकी बन जाती है ढाल अपने भाई की। मां और पापा ने भाई को किस बात पर बिना वजह डांटा यह बताने वाली भी एक बहन ही होती है आंसू भर भर के लड़ जाती है अपने भाई के लिए भाई की चीजो पर हक जमाने वाली भी तो वही होती है। कब वो छोटी बहन अचानक बड़ी हो जाती हैं और दे जाती है झोली भर भर दुआये। अपने भाई से गिन गिन कर हिसाब लेने वाली लड़की जो जीवन पर्यन्त भेजती रहती है बेहि... »

आस्था के कमल

आस्था के कमल ——————– प्रेम और विश्वास के दरिया में ही खिलते हैं आस्था के कमल। तुम खरे उतरना इस विश्वास पर ना मुरझा पाए यह कमल स्मरण रहे। जीवन, यौवन सौंप दिया है तुम्हे तुम्हारी संगिनी ने, तुम भवरे ना बन जाना, ना मंडराना फूल फूल पर सहेज रखना खुद को। जीवन में राह नई मिलेंगी तुम्हें, उन गुमशुदा राहों पर कहीं गुम ना हो जाना! यौवन की उमंग में तितलियां भटकाएंगी ... »

मेरे जाने के बाद

मेरे जाने के बाद ——————– बिखेर दिया है खुद को इस कदर मैंने ….. कि …. मैं ना मिल पाऊं गर तुम्हे … तो ढूंढ लेना मुझे …. मेरे गीतों और रचनाओं में। तुम पर प्रेम छलकाती…. कभी नाराज़गी दिखाती…. किसी ना किसी रूप में मिल ही जाऊंगी। कभी उदासी घेर ले तो शायद मै गुदगुदा दू रचनाओं में छुप कर हंसा दू तुम्हे! बेशक तुम गढ़ लेना कुछ किस... »

हर सदी इश्क की

हर सदी इश्क की ——————— समुद्र पार रेतीले मैदान में उगते गुलाब, नन्ही कोपलों से निकलते हरे पत्र, और नमकीन हवा में घुलती मिठास अनुराग की। मानसिक विरोधाभास के बीच पनपता स्नेह उम्र की सीमा से परे दो प्रेमी युगल। अपना ही आसमां ढूंढते हैं। स्वर्ण आभा युक्त, सूरत से दमकते तेज पुंज और स्वर लहरी का अनूठा संगम जन्म देता है नेह के बंधन को। शायद पूर्वजन्म की अपूर्णता ... »

जनता कर्फ्यू

कहर ढा रही प्रकृति हर पल, कितनी आहें समेटे भीतर, हर दरिंदगी, हर हत्या का चुकता आज हिसाब यही है, एक तरफ पलड़े में आहें, एक तरफ संपूर्ण विश्व है, इतनी बड़ी कायनात पर एक सुक्ष्म जीव की आज धमक है एक तरफ सारे आका है, एक तरफ एक तुच्छ जीव है। कांप रहे डर से सब थरथर, घबराहट का हर जगह दंगल। छीक भी दे तो डर से हाफे भयाक्रांत हो हर पल कांपे। दिन हीन जन खुद को पाते, यमराज साक्षात नजर हैं आते, अभी एक कहर से उब... »

कौन हो तुम?

मैने बहुत सोचा अब नहीं मिलूंगी तुमसे, नहीं कहूंगी कुछ भी। कोई फरमाइश नहीं करूंगी कन अंखियों से देखूंगी भी नहीं। पर इस दिल का क्या करू, तुम्हारी आहट, पदचाप महसूस करते ही, धड़कने बहकने लग जाती है। बिना देखे ही जान लेती है तुम्हारी उपस्थिति। हैरान हूं मै! आखिर कैसे संभव है? इस लेखनी को है स्याही का नशा और मुझे तुम्हारे आने की तलब। जैसे पलाश के फूल और आम की बौर की सुगंध खीच लेती है बरबस अपनी ओर अचानक!... »

प्रेम

चिरायु,चिरकाल तक रहने वाला चिरंतन है प्रेम, निष्काम, निः संदेह निश्चल है प्रेम। पुनरागमन, पुनर्जन्म ,पुनर्मिलन है प्रेम। संस्कार, संभव संयोग है प्रेम, लावण्य, माधुर्य, कोमार्य सा प्रेम। निर्वाक,निर्बोध,निर्विकल्प है प्रेम, यामिनी,मंदाकिनी, ज्योत्सना सा प्रेम। यशगान,गंधर्वगान,स्वर लहरियों सा प्रेम। स्खलित हुआ जो हृदय से वेद ऋचाओं सा प्रेम। जवाकुसुम, कुमुदनी,परिमल सा प्रेम अक्षरक्ष‌:, पांडुलिपि, स्व... »

मै और तुम

मै और तुम ————- अतीत के फफोले, मरहम तुम। अध्याय दुख के सहारा तुम। तपस्या उम्रभर की, वरदान तुम। बैचेनिया इस दिल की, राहत तुम। दिल में फैली स्याही, लेखनी तुम। अक्षुष्ण मौन इस दिल में, धड़कनों का कोलाहल तुम। रुदन धड़कनों का, मुस्कुराहट तुम। लौह भस्म सा ये दिल, चुम्बक तुम। पिंजर बद्घ अनुराग उन्माद तुम। बहती धारा सी में, सागर तुम। निमिषा सिंघल »

प्रारब्ध

प्रारब्ध ——— सदियों से ठंडी, बुझी, चूल्हे की राख में कुछ सुगबुगाहट है। राख़ में दबी चिंगारियों से चिंतित हूं मैं! अपने गीले- सूखे मन की अस्थियों का पिंजर… दबा आयी थी मैं उस गिरदाब (दलदल) में….. वहां कमल उग आए है। राख में दबी चिंगारियों के भग्नावशेषों से उठता धुंआ जैसे लोहे के समान चुम्बक की ओर खिचा चला जा रहा हो.. धुएं को जैसे खीच लिया गया हो फुंकनी से उल्टा । बांध लि... »

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