मित्रता

*प्रातः अभिवादन*

सुवह सुवह जो मित्रता की
ना महक आये ।
जिंदगी व्यर्थ में , दिन -रात सी
चली जाये ।

चंद लमहे ही सही ,दोस्तों के
बीच जियें ,
जिंदगानी की कहानी नयी
लिखी जाये ।
…… . जानकी प्रसाद विवश

प्यारे मित्रो ,
मुसकराओ , दोस्ती के महकते
गुलाबों का साथ निभाओ ।
…… सपरिवारसहर्ष सवेरे की मंगलकामनाएँ स्वीकार करें ।

आपका अपना मित्र
जानकी प्रसाद विवश

Comments

3 responses to “मित्रता”

  1. Abhishek kumar

    Superb

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