सादर नमन ‘सावन’
२/२/२०१८
शीर्षक- ‘मुखौटा’
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चहरे पर चहरे का खेल है,
सूरत सीरत से बेमेल है,
कोई हमको नहीं भाता,
किसी को हम नहीं भाते,
जाहिर सी बात है साहेब,
मुखौटे बदलने के हुनर,
हमको नहीं आते,
एक दिन ज़िन्दगी ने हमसे ही पूछ लिया,
क्या तुझे जिंदगी जीने के हुनर नहीं आते??
दुनिया संगदिल, जेब तंग,
बिलों की अदायगी से खाली है,
पर देखिये जनाब हमने किस तरह,
अपनी मुस्कान संभाली है,
हम मर मिट गए उन पर खुदा,
उन्होंने अपनी हंसी,
सदा कफस में संभाली है,
नकाब ही नकाब हैं,
असलियत अब सदाकत से खाली है,
हम हो जाएंगे फ़ना,
के हमें ईमानदारी की बड़ी बीमारी है,
हमारे सपनों के संसार पर,
दुनियादारी की हकीकत बहोत भारी है ।
..मनीषा नेमा..
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