मुखौटा

बड़े सलीके से मुखौटे के पीछे वो अपना चेहरा छुपा लेता है,
अपनों की हंसी की खातिर वो अपना दर्द भुला लेता है,

कितना मुश्किल है किरदार उस गरीब का यारों,
जो गरीबी की एक चादर में अपना जीवन गुजार लेता है,

यूँही होती नहीं पहचान उस जिस्म के अक्स की हमसे,
जिस चेहरे से मुखौटे वो अपना आईना उतार लेता है।।

राही (अंजाना)

Comments

105 responses to “मुखौटा”

  1. Ashok Sharma Avatar

    वाह बहुत सुंदर कविता

  2. Lalit Avatar

    बेहतरीन

  3. Sanny Avatar

    बढ़िया सर

  4. Madhyam Avatar

    बढ़िया दादा

  5. 1625899290829424 Avatar

    बहुत सुन्दर कविवर राही जी

  6. Nitesh Chaurasia Avatar
    Nitesh Chaurasia

    Nice

  7. Yogendra Avatar

    Very good rahi anjana ji

  8. Himanshu Avatar

    very beautiful poem sir ji

  9. Abhay Avatar

    Behtreen sbdo ka Behtreen prayog, maza aa gaya.

  10. Navin Avatar

    दिलचस्प और करीने से गढ़ा है शब्दों का ताना बाना

  11. Shakun Avatar

    सभी मित्रों और भाइयो को धन्यवाद मुझे जितांने में मदद की।

  12. Abhishek kumar

    Nice

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