मुझसे वो अब बड़ी तंगदिली से मिलता है
ऐसे लगता है जैसे किसी अजनबी से मिलता है।।
अब उसके मिलने में वो पहली जैसी बात कहाँ
जमाने को दिखाने को ही शायद गले मिलता है।।
ये तो हम ही है जिसे सब बेवफा समझते है
उसका जिक्र अब भी वफ़ाओं की किताबो में मिलता है।।
उसकी आँखों मे अब भी भरी है नमी प्यार की
फिर भी वो बड़ा मुस्कुरा के मिलता है।।
रिश्ते कब के तल्ख हुए जो थे हमारे दरमियां
फिर भी वो आ सबसे पहले हमी से मिलता है।।
मुझे देख अब भी एक बार जरूर मुस्कुराते है वो
भरी महफ़िल में अब भी हालचाल पूछने आता है वो ।।
तुम्हे छोड़ फिर कभी किसी को अपनाया ही नही
ये बात हर बार हर महफ़िल में मुझे बताता है वो।।
ये अलग बात है अब हमारी मुलाकात नही होती
मेरी रूह मेरी सांसो में अब भी समाता है वो।।
हम भी जानते है ये अब भी प्यार है उन्हें
फिर हम से ही क्यूं दूरियाँ की शर्त लगता है वो।।
@प्रदीप सुमनाक्षर
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