मुसाफिर अपनी राह

मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है
मृग जाने किस चाह से भटक रहा है

रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं
दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है

किस सत्य की खोज में मन व्याकुल
कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा है

अदृश्य विलक्षण तरंगे घूमती तेरे अंदर
मानव फिर किस चाह से भटक रहा है

मोह तेरा कवच के चक्रव्यूह में फंसा
मन कवच की दाह से भटक रहा है

राजेश’अरमान’

Comments

6 responses to “मुसाफिर अपनी राह”

  1. Ajay Nawal Avatar
    Ajay Nawal

    nice poetry…last two line are really nice

    1. rajesh arman Avatar
      rajesh arman

      thanx ajay

  2. UE Vijay Sharma Avatar
    UE Vijay Sharma

    किस सत्य की खोज में मन व्याकुल
    कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा है … beautiful ..Subhan Allah

  3. Rohan Sharma Avatar
    Rohan Sharma

    beautiful poetry 🙂

    1. rajesh arman Avatar
      rajesh arman

      thanx rohan

  4. Abhishek kumar

    😃😃

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