मैं अकेला….

मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला रह गया,
ज़िन्दगी की धूप छाँव सब खुशी से सह गया।
टूटा हूँ पत्ते सा क्यूँकि मेरी सूखी डाली है,
न खता हवा के झोंकों की न दोसी कोई माली है।
जबसे तुमने नींव तोड़ी है मेरे विश्वास की,
मैं किसी कच्चे मकाँ सा भरभरा के ढह गया।
मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला रह गया।

इक पवन मद्धम सी शीतल है मैं उससे जुड़ गया,
बन के वो तूफान मुझको संग लेके उड़ गया,
सारे हृदय की पीर बस एक साँस में ही पी गया,
मुख से निकली आह न होठों को ऐसे सी गया।
इक फूल था मैंने सजाया अपनें दिल की सेज पे,
वो फूल मेरे हृदय में ही शूल बन के रह गया।
मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला रह गया।

मैंने समझा खुद को जैसे मैं कोई चट्टान हूँ,
आई तेरी बाढ़ ऐसी मैं ही मुझ से बह गया।
तृप्ति की इक बूँद पीने को मैं मुख फैलाये था,
वो गिरी जब कंठ, मैं आकंठ बिष से भर गया।
तेरे अहसासों की छुवन अब बन गये मेरे कफ़न,
तेरी यादों की चुनरिया में दफन हो सो गया।
मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला हो गया।

अभिषेक सिंह।

Comments

One response to “मैं अकेला….”

  1. Abhishek kumar

    Good

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