मैं संघर्ष कर रहा हूँ
मैं संघर्ष कर रहा हूँ
एक ‘मैं’ हूँ अपने ही जैसा एक ‘मैं’ और भी है
इन दोनों ‘मैं’ में तालमेल बिलकुल भी नहीं
फिर भी मैं रखता हूँ दोनों को अपने साथ
अपने जिस्म में ,रूह की गहराईयों में
कभी एक ‘मैं ‘ मेरा दर्द होता है
तो दूसरा ‘मैं’ दवा बन जाता है
कभी एक ‘मैं’ मेरा दोस्त होता है
तो दूसरा ‘मैं ‘ दुश्मन बन जाता है
इन दोनों ‘मैं’ में से बस एक ही
समय एक ही ‘मैं ‘मेरे अस्तित्व
की परछाई बन दुनिया को दिखता है
मेरे अंदर दो ‘मैं’ रहते है
अस्तित्व केवल एक ‘मैं’ का
आज तक मैं दुसरे ‘ मैं’ को उसका
हक़ नहीं दिला पाया हूँ
क्योकि दोनों में से एक ही ‘मैं’
को मिली है नागरिकता
बस अपराधबोध पनपता है
एक उस दुसरे ‘मैं’ के
नाजायज होने का
अब भी उस दूसरे ‘मैं ‘के लिए
मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..
मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..
राजेश’अरमान’
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