मैने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा,
पैसे के लिए आदमी को बदलते देखा।
वो जो चलती थी, झनझनाहट की होती अवाज,
आज उनकी झनझनाहट की अवाज के लिए कान को तरसते देखा।
जिनकी परछाई को देखकर रूक जाते थे हम—
आज वो दुसरे के हाथ मे हाथ डालकर मै जाते देखा।।
जिनके अवाज मे अपना –पन था,
आज वही जुबाएँ ,वही अवाज मे, बिजली जैसे कड़कने की अवाज को देखा।
पहले हाथो की इशारो से रूक जाती थी वो–
आज चिल्लाने के बाद रूक ना पाई वो।
जिनके होठो पर खुशी रहती मेरे नाम की—
आज वही होठो पर चुप्पी का ताला देखा।
ज्योति
मो न० 9123155481
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