यामिनी

यामिनी बीत ही जाती है
चाहे कितनी ही गहरी हो
चाहे कितनी स्याह भरी हो
मगर बीत ही जाती है।
सच्चाई को दबा दे कोई
लाख यत्न कर ले
सच्चाई सच्चाई ही है
निखर ही जाती है।
कोई कितना यत्न करे
नफरत की पोटल बांधे
प्यार के आगे रेत नफरत की
बिखर ही जाती है।

Comments

One response to “यामिनी”

  1. कवि सतीश जी की सुन्दर और सच्ची प्रस्तुति

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