ये चाँद गर न होता
होती ये काली रातें।
दो प्रेमियों के दिल की
रहती अधूरी बातें।।
नौका विहार नाहीं
नहीं प्यार प्यार होता।
मस्ती में मस्त निशचर
उपद्रव हजार होता।।
मायूस ये चकोरा
बिन चांदनी के होते।
कवियों के दिल विनयचंद
न जागते न सोते।।
न होती चंद पंक्ति
न होती ये कबिता।
साहित्य खाली होता
न होती प्रेमगीता।।
दीदार कर विनयचंद
आकाश के परी को।
जिसने लगाया भू पर
साहित्य के झड़ी को।।
…………..पं़विनय शास्त्री…………
ये 🌙 गर न होता
Comments
One response to “ये 🌙 गर न होता”
-
wah
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.