Pt, vinay shastri ‘vinaychand’'s Posts

उदास खिलौना : बाल कबिता

मेरी गुड़िया रानी आखिर क्यों बैठी है गुमसुम होकर। हो उदास ये पूछ रहे हैं तेरे खिलौने कुछ कुछ रोकर।। कुछ खाओ और मुझे खिलाओ ‘चंदा मामा….’ गा-गाकर। तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग डम -डम ड्रम बजाकर ।। वश मुन्नी तू इतना कर दे। चल मुझ में चाभी भर दे।। देख उदासी तेरा ‘विनयचंद ‘ रहा उदास खिलौना होकर। मेरी गुड़िया रानी आखिर क्यों बैठी है गुमसुम होकर।। »

वर स्वरुप में बमबम : अनुदित रचना

वर स्वरुप में बमबम मालतीमालया युक्तं सद्रत्नमुकुटोज्ज्वलम्। सत्कण्ठाभरणं चारुवलयाङ्गदभूषितम्।। वह्निशौचेनातुलेन त्वतिसूक्ष्मेण चारुणा। अमूल्यवस्त्रयुग्मेन विचित्रेणातिराजितम्।। चन्दनागरुकस्तूरीचारुकुङ्कुमभूषितम्। रत्नदर्पणहस्तं च कज्जलोज्ज्वललोचनम्।। . भाषा भाव मालती बड़ माल शोभित,रत्न मुकुट बड़ चमचम। कंगन बाजूवन्द मनोहर,हार गला में दमदम।। अगर लेप तन चंदन केशर,रेख त्रिपुण्ड ललाट में साजल। वसन अनूप र... »

दुलहिन गिरिजा माता : अनुदित रचना

दुलहिन गिरिजा माता सुचारुकबरीभारां चारुपत्रकशोभिताम्। कस्तूरीबिन्दुभिस्सार्धं सिन्दूरबिन्दुशोभिताम्।। रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षसा सुविराजिताम्। रत्नकेयूरवलयां रत्नकङ्कणमण्डिताम्।। सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च चारुगण्डस्थलोज्ज्वलाम्। मणिरत्नप्रभामुष्टिदन्तराविराजिताम्।। मधुबिम्बाधरोष्ठां च रत्नयावकसंयुताम्। रत्नदर्पणहस्तां च क्रीडापद्मविभूषिताम्।। भाषा भाव केशपाश कुसुमित सालि पत्र रचित बड़ सुन्दर। कस्तूरी सि... »

पीले खेत

आया है मधुमास मास माघी का पावन। नव किसलय तरु शोभित क्या उपवन क्या कानन।। फूलों की क्यारी सज गई सारी रंग-बिरंगे फूलों से। कोयल काली तरु की डाली झूले नित झूलों से।। पीली सरसों पीले खेत जिमि सजनी संग साजन। »

आ गया वसन्त (सोरठा छंद)

आ गया वसन्त आज, फिर पतंग हम उड़ाऐंगे। कोकिलों की आवाज, मिल संग संग दोहराऐंगे।। »

हरि हरि

हवा चले जब ठंढी ठंढी। मनवा बोले तब हरि हरि।। »

मानुष जनम

सिया राम जी केॅ चरण हमरा मन में रमल। जे हम हेती करिया भौरा पुष्प पराग मुख भरल ।। चरण छुवि हम नित नित जनम कृतारथ करल। विनयचंद मानुष जनम नाम रटन हित धरल।। »

शायरी

न नखरा करेंगे न इजहार करेंगे। हम तो सिर्फ वसन्त के आने का इंतजार करेंगे।। »

संकट चौथ

आया माघ का महीना । लेकर खुशियाँ नवीणा। । संकटचौथ पहला त्यौहार। व्रत करे सब निर्जल धार।। गणपति जी की करे आराधन। माँ संकटा करे संकटनाशन। । दर्शन चन्द्र सदा सुखदाई । अर्घ सहित पूजन फल पाई।। »

पावन मास मास

पूस गया ठण्ढी गई छाया नव उल्लास। कर सेवन त्रिवेणी तू आया पावन मास।। आया पावन मास माघ अतिसुखकारी। स्नान ध्यान पूजन कथा करे अपहारी।। कथा करे अघहारी विनयचंद नाम जपा कर। पा मानव तन निर्मल तिल गुड़ कुछ दान कर।। कम्बल स्वेटर और रजाई दीनन को दान करो रे भाई। सेवा करो सदा दुखियों की सदा सहाय रहे रघुराई।। »

गठबंधन

तीन छात्र थे केवल कक्षा में। आ बैठ गए तीनों परीक्षा में।। प्रथम श्रेणी में पास किया एक दूजा द्वितीय दर्जे को पाया। तीजा तेतीस फीसदी लाकर तीजे दर्जे तीजे स्थान पे आया।। अफसोस कि तीनों आखिर छात्रवृत्ति से कुछ दूर रह गए। बासठ पर पहला अटका है छप्पन पर मगरुर रह गए।। सोच में देख दोनों को तीजा लगा ठहाका जोर से बोला। मिले वजीफा पच्चासी पर फिर क्या मुश्किल है भोला।। बारी -बारी तुम दोनों से गठबंधन आ मैं करत... »

बम्बई मिठाई वाला

टन- टन टन- टन करते वो फेरीवाला आता था। गदा के जैसे डब्बा अपने काँधे पर ले आता था।। सिर पे टोपी गले में गमछा नाक पे ऐनक बड भाता था। बम्बई मिठाय,,लड़का सब खाय बूढ़ा ललाय गाते गाते आता था।। खड़ा हो गया घर के आगे हम बच्चों की टोली आई। आजा बाबू पास हमारे लेकर आया बम्बई मिठाई।। दस पैसे में माला ले लो घड़ी मिलेगी चार आने में। मात्र अठन्नी काफी है एक मोटरसाइकिल बन जाने में।। पूरा रुपया लेकर आओ तुम्हें दिख... »

थल सेना दिवस पर देशक सिपाही केर सम्मान में मिथिला केर भाव

हमर देशक सिपाही हमर शान छै। देशक रक्षा में जिनकर प्राण छै।। नञ भोजन केॅ कोनो फिकीर छै। नञ छाजन केॅ कोनो फिकीर छै।। जाड़ गरमी तऽ एकहि समान छै। हमर देशक सिपाही हमर शान छै।। देशक रक्षा में…. छोड़ि जीवन केॅ आस मोन में भरल हुलास छोड़ि चिल्ला केॅ मोह नञ तिरिया बिछोह देशक रक्षा में तन मन प्राण छै। हमर देशक सिपाही हमर शान छै।। देशक रक्षा में…. कहियो असमिया पहाड़ी कहियो चंबल केॅ झाड़ी कहियो समु... »

लोहड़ी की बहार है

खुशियाँ अपार है प्यार का त्योहार है। वेहरे बीच आग जली लोहड़ी की बहार है।। गैया का गोबर पाथ-पाथ पाथी लिया बनाय। सुक्खा लक्कड़ काट-काट लोहड़ी लिया सजाय ।। घच्चक मूंगफली रेवड़ी संग खिल्लां का भण्डार है। आजा वीरां नच्चां गावां लोहड़ी दा त्योहार है।। खुशियाँ अपार है………. दादा जी दे गोद बैठ जा काका काकी आन के। लोहड़ी दा इतिहास सुनावां खुशी परव महान के।। दुल्ला भट्टी के शौर्यकथा की कहानी... »

ठंढी में चाय

ठंढी का मौसम आया है। संग मेरा मान बढ़ाया है ।। पुलकित होकर कहता चाय। बार – बार सब मांगते चाय।। कभी खुशी कम हो जाती है। जब बीच पकौड़ी आ जाती है।। झुंझला के रह जाता ये चाय। च्यवनप्राश क्यों आया भाय।। »

मानव जनम न बेकार करो

अमृत बेला है अतिपावन। उठो रे तू छोड़ विभावन।। हरि का सुमिरन कर लो रे। सैर करो तू सुबह -सबेरे।। शीतल मंद हवा सुखदाई। योग प्रणायाम करो रे भाई।। तन -मन को निर्मल कर लो। मीठी वाणी मुख से बोलो।। कर्मशील बन रोजगार करो। दीनन हित परोपकार करो।। मानव जनम न बेकार करो। ‘विनयचंद’ भव पार करो।। »

रिक्शा

एक निर्जीव -सी मोटर गाड़ी । शानो शौकत की बनी सवारी।। ये भी मांगे तेल और पानी। घिस गए पुर्जे हुई पुरानी।। अपने जैसा वंदा अखीर। खीचे रिक्शा लगा शरीर ।। एक अकेला खींच रहा हो। हम बैठे हो आखिर दो दो।। खून पसीना बहा रहा है। रामू से रिक्शा कहा रहा है।। शर्म नहीं आती क्यों हमको। न उचित मजूरी देते उसको।। ‘विनयचंद ‘ वो भी मानव है उसका नित सत्कार करो। उसका भी एक परिवार है ,सेवक बन आधार बनो।। »

हिन्दी का समुचित विकास कैसे हो?

आखिर हिन्दी का विकास कैसे हो, एक विचारणीय विषय है। हिन्दी दिवस पर अपने मित्रों एवं सहकर्मियों को बधाई देकर एक औपचारिकता पूर्ण करने मात्र से क्या हिन्दी का विकास हो जाएगा। पूरे सप्ताह भर या फिर पन्द्रह दिन का हिन्दी पखवारा महोत्सव मना लेने मात्र से क्या हिन्दी का विकास हो जाएगा। यह एक यक्ष प्रश्न है। वास्तव में ,अपने देश में वर्तमान कालीन परिवेश में भाषा तीन स्वरूप में है। १. मातृभाषा, जो परिवार से... »

शायरी

साहित्य के वो योद्धा तलवार नहीं उठाते । लड़ते जरूर हैं पर लड़ाकू नहीं कहाते।। »

जाड़ा का मौसम

जाड़ा का मौसम बड़ा सुहाना। भाँति -भाँति के बनते खाना।। गाजर का हलुआ सबको प्यारा। खाओ मूंगफली भगाओ जाड़ा।। गाजर शलग़म मूली का अचार। बड़े स्वाद लेकर खाए सब यार।। आंवले को खा पानी पीना। मूंह का मीठा -मीठा होना।। च्यवनप्राश भी खाने को मिलते। गेंदा गुलाब के फूल भी खिलते।। ताजे -ताजे गुड़ भी घर में। घच्चक रेवड़ी सजा शहर में।। ऐसा सुंदर शरद है काल । हम बच्चे हो गए निहाल।। *************बाकलम******** बालकव... »

कविता लिखने की कला

आओ बच्चों तुम्हें सिखाए कविता लिखने की कला। कुछ शब्दों को ध्यान में रखो मिल जायेगी काव्य कला।। कल खल गल घल -घल घल । चल छल जल झल -झल झल।। डल ढल डल टल -टल टल । तल दल नल थल -थल थल।। पल फल बल मलमल मल। रल शल हल कलकल कल।। यही सार्थक शब्द हैं प्यारे। रल मिल बना कवित्व रे प्यारे। »

टिम टिम करते लाखों तारे

टिम टिम करते लाखों तारे *********************** टिम टिम करते लाखों तारे। देखो लगते कितने प्यारे।। सुन्दर आकास सजा है ऐसे। हीरे-मोती से थाल भरा है जैसे।। बैठ के अंगना सदा निहारूँ। एक भी मोती कभी न पाऊँ।। एक तो आओ मेरे आंगन। साथ में खेलूँ होय मगन।। एक तारा जब टूटा था। शुभ सगुन ये छूटा था।। एक मनौती पूरण कर दो। खाली झोली मेरी भर दो।। चंदा को अपने पास रखो। चंदा सम वीरा खास करो।। सबकी मनौती पूरी होती। ... »

मुख खोलो

मुख खोलो कुछ बचन कहो इसमें क्या कोई घाटा है। रौनक क्योंकर खोई -सी है आज पटल पर सन्नाटा है।। »

हाय मैं सड़क बेचारी

मैं सड़क बेचारी ज्यों अबला नारी। पग पग दलित परम दुखियारी।। हाय मैं सड़क बेचारी काट दिया कोई कहीं पर और बहा दिया पानी घर का। भोजन के दोनें और छिलके सब फेंक रहे मेरे ऊपर आ।। चले बटोही नाक बन्द कर थूके और देकर कुछ गारी।। हाय मैं सड़क बेचारी…… गंदे लोग गंदी प्रशासन कमर टूट गई जिसके कारण।। आखिर कहाँ गुहार लगाऊँ मैं नहीं जाती दफ्तर सरकारी।। हाय मैं सड़क बेचारी… जीर्णोद्धार होगा पुनर्नि... »

पूस में किसान

कुछ दिन बचे हैं पूस के ये भी निकल हीं जाऐंगे। सर्दी है चारों ओर व्यापित कब तक हमें सताऐंगे।। क्या कंबल रजाई कफी है सर्दी भगाने के खातिर। तन मन की गर्मी काफी है खुद को बचाने के खातिर।। बेशक़ बिछौना पुआल का सुख नींद सुला जाऐंगे।। तन पे फटी है चादर जलती अंगीठी आगे। बैठे हैं खेतों के मेड़ पे सारी सारी रात जाने। कुछ दिन की तो बात है अच्छी फसल ही पाऐंगे। बादल घने आकाश मे घनी अंधेरी रात है। किनमिन -सी हो... »

वही सागर का तट

वही सागर का तट बालुकामय सतह। जहाँ आनन्द मनाया कुछ इस तरह।। खाया -खेला नाचा-गया। गीले बालुका पर अंगूठा घुमाया। कुछ इस तरह।। अंकित हुआ बीस सौ बीस। कितने दुखो के भरे हैं टीश।। सागर के लहरों ने मिटा दिया वो अंकन। पर दिल में एक अधूरी यादों का है कंपन।। शायद लिखा हुआ होगा अब तक ज्यों का त्यों। चल पड़े आज फिर उसी ओर आखिर क्यों।। शायद कुछ खोजने और करने मन को हल्का। वही अधूरी यादे अंकित बीस बीस हल्का।। समझ... »

एक बार यमराज आया धरती पर

एक बार यमराज आया धरती पर। सोच में पड़ गया मानव को देखकर।। क्या खुशनसीब हैं ये इन्सां। मरणशील को कारें कारें मैं अमर यमराज को केवल भैंसा।। देखा सोचा झल्लाना बैठ गया सिर ठोंककर। एक बार यमराज आया धरती पर।। कुछ क्षण बीता नजरें दौड़ा। दिखा नहीं कुछ आवाजें आई।। नारेबाजी कर ले हाथ में झंडा। दौड़ रहे हैं साथ साथ मुस्टंडा।। पूछन लागे यमराज महाशय हाथ जोड़ विनती कर।। एक बार भाई साहब बतलाओ क्या कर रहे आप लोग।... »

मैं तो बिल्कुल बच्चा था ***********************

जब कागज का नाव बनाया मैं तो बिल्कुल बच्चा था। तन का थोड़ा कच्चा था पर दिल का बड़ा ही सच्चा था।। जब कागज का नाव बनाया …. पतंग बनाया कागज का और एक जहाज भी कागज का। कार बनाया ट्रक बनाया ट्रैक्टर ट्राली भी था कागज का।। बिन ईंधन के चलते थे सब सोचो कितना सब अच्छा था! जब कागज का नाव बनाया…. *****बाकलम**** बालकवि पुनीतकुमार ‘ऋषि ‘ बस्सी पठाना ( पंजाब) »

अनोखा जी चले बाजार

अनोखाजी चले बाजार। टौर से हो फटफटि सवार।। साथ में चली श्रीमति जी। चहक रहे थे आज पतिजी।। कितने अच्छे हैं टमाटर। आओ खरीदे साथ मटर।। क्या यार तुम भी हद करती हो। क्या फिर साॅपिंग रद करती हो? फेरीवाला था एक फुटपाथ पे। लेकर बैठा वस्तु बहुत साथ में ।। छलनी सूप और झाड़ू पोछा । आओ खरीदे चलकर सोझा।। बस भी करो यार। ये कैसा बाजार।। मोहतमा गुमसुम चलती रही। कुछ बातें उसको खलती रही।। जैसे दिखा एक बर्तन दूकान। फू... »

गीत

मेरी सांसों पे तेरा अधिकार हो गया। लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।। ना सूरत पसन्द, ना शोहरत पसन्द तेरी चाहत पे ऐसा इकरार हो गया। लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।। मुझे चंदा-सी सूरत नहीं चाहिए। संगमरमर की मूरत नहीं चाहिए।। तेरी सीरत हीं तेरा सिंगार हो गया। लो सजनी मुझे तुमसे प्यार हो गया।। दूरियां अब अपनी खतम हो गई। मेरा सजना मैं तेरी सनम हो गई।। दिल की दुनिया पे अपना अधिकार हो गया। लो सजना मुझे त... »

ज़िन्दगी के इस खेल में

तेरी परछाई को देख लेता हूँ चेहरे को देखने का मौका कहाँ मिलता। ज़िन्दगी के इस खेल में दौड़-दौड़ दौड़ लेता हूँ चौका कहाँ मिलता।। »

एकादशी नामावली

मार्गशीर्ष मास अतिपावन। उत्पना व मोक्षदा सुहावन।। सफला अरु पुत्रदा एकादशी। पौष मास मह बहु सुखरासी ।। षटतिला अरु जया बड़नामी। माघ मास के उत्तम फलकामी ।। विजया आमलकी फागुन मास। पापमोचनी कामदा मधुमास।। बरुथिनी और मोहिनी बैशाखे। जेठ अपरा व निर्जला आखे।। योगिनी देवशयनी कहलावे। आषाढ़ महिने में मन भावे।। पवित्रा पुत्रदा सावन मासा। अजा परिवर्तनी भादो माना।। आसिन इन्दिरा पाशांकुशा आवे। रमा देवोत्थानी कार्त... »

बड़ी अजीब है ये घुँघरू

बड़ी अजीब है ये घुँघरू। बन्धे जब दुल्हन के पैरों में बड़े खुशनसीब है ये घुँघरू।। झनकती जब ये कोठों पर बड़े हीं गरीब हैं ये घुँघरू । बांध के किन्नर भी नाचे पर बदनसीब है घुँघरू।। पीतल के हो या हो चांदी के कला के नींब है ये घुँघरू। विनयचंद साहित्य सरगम के सदा करीब है ये घुँघरू।। »

हम किसान धरने पर

एक तो शीतलहर दूजा बेगाना शहर। फिर भी अटल रहेंगे हम किसान धरने पर।। हम क्यों माने हार बंधु हम तो हैं अन्नदाता जग में। पेट चले संग फैक्टरी चले व्यापार पले अपनी पग में।। मांग नहीं अपनी सोना है ना मांगें हीरा-मोती हम। अपनी फसल के घटे दाम कभी न बर्दाश्त करेंगे हम।। आलू होवे दो की अपनी लेज बिके चालीस की। अपना चिप्स बना खाऐंगे मनो बात ख़ालिस की।। विनयचंद ना दुखी रे जिसका हम सब खाते हैं। हट जा बादल नभ मंड... »

सर्दी की धूप

सर्दी की धूप बड़ी सुहानी सेवन कर प्राणी सुखदाई । चेतन जीव की क्या कहिये सुख जड़ जात भी पाई।। ठण्ड हरे नित जीव जगत के अमराई नित भोजन पावै। विनयचंद विटामिन डी से अश्थि सबल बन जाते।। »

लो फिर आ गई है सर्दी

लो फिर आ गई है सर्दी पूरे लाव -लश्कर के साथ में। हवा भी ठण्ढी सूरज मद्धिम घना कुहासा दिन और रात में।। बिन बादल के बारिश जैसी गीलापन हर डाल -डाल व पात में। आठ नहीं हैं बजे अभी कम्बल में दुबके हैं सभी जैसे कर्फ्यू लग गई हो हर रात में ।। शबनम की बूंदें मोती जैसे तरुपल्लव और कुसुम कली पर। चम-चम चमक रहे हैं ऐसे टिमटिम धवल सितारे से नीलाम्बर।। दुबले भी मोटे दिखते हैं चढ़ा गरम कपड़े निज गात में। ‘व... »

सुप्रभात लिखते लिखते

सुप्रभात लिखते -लिखते फिर से सबेरा हो गया । उपालम्भ आया फिर भी आखिर ऐसा क्या हो गया? »

ममता

ममता मूल दुखद तरुवर के ,नैनन नीर बहावे। निर्मोही जड़ जीव जगत में ,सुख सरिता बहावे।। श्वान शुका अजशावक जे , मरत मूढ़मति आवे। निश-दिन मूषक मरत बथेरे, केहू ना दुख मनावै »

ममता

ममता मूल दुखद तरुवर के ,नैनन नीर बहावे। निर्मोही जड़ जीव जगत में ,सुख सरिता बहावे।। श्वान शुका अजशावक जे , मरत मूढ़मति आवे। निश-दिन मूषक भरत बथेरे, केहू ना दुख मनावै।। »

भारत रत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के जन्मदिन पर विशेष

तीन दिसम्बर अठारह सौ चौरासी का पावन दिवस मनोहर था। घर-घर मंगल गान गुंजते बजे बधाईयाँ संग सोहर था।। आसमान से टपक सितारा आया बिहार के एक गांव में। सारण उर्फ सीवान जिले के जीरादेई नामक सुंदर गांव में।। लाल थे वो महादेव सहाय के कमलेश्वरी देवी के आँखों का तारा। पाँच भाई-बहनों में राजेन्द्र थे सबसे छोटा और सबसे प्यारा ।। जगदेव सहाय थे चाचाजी जमींदार बड़े और दिल के प्यारे। करते थे नित प्यार इन्हें और ... »

तवायफ़

अश्कों का समन्दर है अँखियों में मेरी एक कागज की किश्ती कहाँ से चलेगी। है ये बदनाम बस्ती हमारी सनम इश्क की फिर कलियाँ कहाँ से खिलेगी।। रोकड़े में खरीदे सभी प्यार आकर प्यार की ज़िन्दगी पर कहाँ से मिलेगी। मजबुरियों ने मुझको तवायफ़ बनाया ‘विनयचंद ‘ बीबी कहाँ से बनेगी।। »

सौगात माँगता है

मेरी जान तुम्हारे जान का सौगात माँगता है। ये जान लिया, जब जान मेरी , ले जान हथेली दिन-रात माँगता है। । लाँघ नफ़रत की दरिया मुश्कत से इश्क का एक सरोवर आबाद माँगता है। बीत जाएगी ये रात काली ऐ ‘विनयचंद ‘ जुगनू -सी औकात माँगता है।। »

मुस्कुराने की दवा चाहिए

बहुत गमगीन हो रही ज़िन्दगी मुस्कुराने की दवा चाहिए। मर्ज बनकर खड़ी है नफरते प्यार की एक हवा चाहिए।। चाहते हैं सभी सेकना रोटियाँ तप्त-सा कोई तवा चाहिए। इन्सान बनकर रहे सर्वदा बनने को ना खुदा चाहिए।। प्रेम की दुनिया सलामत रहे हर नजर इश्के अदा चाहिए। ये ‘विनयचंद ‘ मायूस होना नहीं दिल दरिया दया पे खरा चाहिए।। »

घड़ी

एक छोटी -सी डब्बी में नाचती हैं सूईयाँ बेशक बन्द होकर। पर नचाती है सारी दुनिया को अपनी हीं नोंक पर।। न ठहरती है कभी न कभी ठहरने देती है। ये तो घड़ी है ‘विनयचंद ‘ दुनिया को घड़ी बना देती है।। »

शायरी

कलम भी वही है दावात भी वही है। दिल में भरे मेरे जज़्बात भी वही है ।। लिखना चाहूँ मै एक गजल आप पर पर क्या करे अपनी मुलाकात नहीं है।। »

क्या खराबी है कि मियां शराबी है

क्या खराबी है कि मियां शराबी है । शराबी की बीबी हूँ इसमें भी नवाबी है।। रोज पकौरे और सलाद दिखते घर में हो आबाद नल में पानी हो न बेशक़ मेज सजा शर्बते गुलाबी है। क्या खराबी है कि मियां शराबी है।। घर में इन्टरी होती जब करते खूब भले कोहराम। बच्चे सहमे-सहमे-से बिना नींद के करे आराम।। जूठी बासी भोजन को भी समझ रहा स्वादिष्ट कबाबी है। क्या खराबी है कि मियां शराबी है।। कुत्ते संग भी सो जाता है नशे में होकर... »

आखिर ये है कैसा संताप

पति की गलती पुत्र की गलती गलती करे चाहे भाई-बाप। हर गलती पर रोए नारी आखिर ये है कैसा संताप।। अपराध नहीं करती कोई एक अपराधी की बन रहती। बस यही एक अपराध सदा अँखियाँ आँसू भर नित सहती।। ‘विनयचंद ‘ ममता नारी की कवच रूप जो पाकर। निज उत्कर्ष करे न न औरों का बने ठहर।। वीर नहीं कायर है जग में नारी को रुलानेवाला। नमकहलाल बनो विनयचंद नित नित नमक खानेवाला।। »

सावन पे

लेके छठी मैया का प्रसाद हम आए आज सावन पे। मैया का गाए गुणा नुवाद देखो आज सावन पे।। जीवन में ना होवे विषाद अपने प्यारे सावन पे। कृपा प्रसाद रहे आबाद अपने प्यारे सावन पे।। »

सुस्वागतम् पाण्डेयजी

सुस्वागतम् पाण्डेयजी क्या आप में आकर्षण है मंच पर आने से सिर्फ सावा घड़ी पहले खींच लिया मेरे दिल से कविता। बीत गई वो रातें काली नव प्रभात ले आया सविता।। »

खुद में खुदा

कतरा -ए-आब लपक लेते हैं सभी भरे समन्दर को कोई चुराया है क्या ? पकड़ के कबूतर उड़ा लेते हैं सभी कोई बाजों को आखिर उड़ाया है क्या? जलक्रीड़ा करे कोई बर्फों से खेले आग से भी कोई आखिर खेला है क्या? एक निर्बल के आगे सभी शेर हैं कोई बलवानों को आखिर धकेला है क्या? ऐ ‘विनयचंद ‘ कभी न तू निर्बल बनो जब खुद में खुदा फिर तू अकेला है क्या? »

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