Pt, vinay shastri ‘vinaychand’'s Posts

सावन पे

लेके छठी मैया का प्रसाद हम आए आज सावन पे। मैया का गाए गुणा नुवाद देखो आज सावन पे।। जीवन में ना होवे विषाद अपने प्यारे सावन पे। कृपा प्रसाद रहे आबाद अपने प्यारे सावन पे।। »

सुस्वागतम् पाण्डेयजी

सुस्वागतम् पाण्डेयजी क्या आप में आकर्षण है मंच पर आने से सिर्फ सावा घड़ी पहले खींच लिया मेरे दिल से कविता। बीत गई वो रातें काली नव प्रभात ले आया सविता।। »

खुद में खुदा

कतरा -ए-आब लपक लेते हैं सभी भरे समन्दर को कोई चुराया है क्या ? पकड़ के कबूतर उड़ा लेते हैं सभी कोई बाजों को आखिर उड़ाया है क्या? जलक्रीड़ा करे कोई बर्फों से खेले आग से भी कोई आखिर खेला है क्या? एक निर्बल के आगे सभी शेर हैं कोई बलवानों को आखिर धकेला है क्या? ऐ ‘विनयचंद ‘ कभी न तू निर्बल बनो जब खुद में खुदा फिर तू अकेला है क्या? »

दीप ऐसा जलाओ

दीप ऐसा जलाओ ************************ *********************** दीप ऐसा जलाओ ऐ दिलबर हर तरफ रौशनी -रौशनी हो। न अमावस की हो रात काली हर निशा चांदनी -चांदनी हो।। कोई जलाए दीप कंचन का और जलाए कोई चांदी का। श्वेद सिक्त माटी ले वतन की दीप माला बने सुखराती का।। प्रेम का तेल निष्ठा की बाती ज्ञान की राह रौशनी रौशनी हो।। दीप ऐसा कोई मंदिर में जाके जलाए और जलाए कोई निज घरों में। कोई पनघट पे जाके सजाए और जलाए ... »

मैथिली गीत

सगरों साल बहानेबाजी आय नञ चलत सजना। धनतेरस में चांदी नाही चाही सोनक गहना।। पैरक पायल नहियें लेबय लेबय हाथक कंगना। धनतेरस में चांदी नाही चाही सोनक गहना।। नञ औंठी न लेबय नथिया कर्णफूल नञ चाही। सब कंजूसी छोड़ि छाड़ि केॅ जुनि करू कोताही।। चमचम हीरा मोती लागल लेबय सोनक कंगना। धनतेरस में चांदी नाही चाही सोनक गहना।। हम कोनो उपहार न मांगी । नौलक्खा हम हार न मांगी। । ‘विनयचंद ‘हम अहीं के प्यारी... »

धनतेरस की शुभकामना

अवतार लिए धन्वंतरि सुधा कुम्भ ले हाथ। आरोग्य के हैं देवता नमित करो निज माथ।। आधि व्याधि सब मिटे होय जगत कल्याण। धनतेरस की शुभकामना विनय करे प्रदान।। धनपति श्री कुबेर की कृपा रहे दिन रात। विनयचंद की प्रार्थना सबजन हित सौगात।। »

दिल का दीप

न होती हर रात अमावस की न होती हर रोज दिवाली है। जब दीप जले दिल का दिलबर समझो उस रोज दिवाली है।। »

चांद से

ऐ चाँद भला क्यों इतरा रहे हो जल्दी छत पर आओ ना। भूखी-प्यासी प्यारी मेरी कब से बाट निहारे आओ ना।। कितनी सज-धज के आई अब तो यूँ इतराओ ना। जल भी है मिष्ठान्न भी है फल फूलों का भोग लगाओ ना।। »

सरगी लेकर आई है

उठ जा लाडो सरगी लेकर तेरी सासु अम्मा आई है। हाथ दिखाओ मेंहदीवाली कित प्रीत पिया की पाई है।। पहिला रंग पिया का प्यार । दूजा सास-ससुर का लाड़।। तीजे गण गौरी की भक्ति बीच हथेली छाई है।। उठ जा…. उपवास रखेगी लाडो मेरी गणपति जी की भक्ति में। रहो सुहागन सुख शांति से धन आयु बल बुद्धि में।। पौ बारह नित रहे पिया की भावना हृदय समाई है।। उठ जा… सास बहू में अन्तर कैसा दोनों नारी ममता की मूरत। एक पत... »

लाॅकडाउन ने खाया सब

यूँ हीं बैशाखी चली गई बिन भंगरा बिन गिद्दा के। फीके सारे पर्व पर गए बिना खीर -मलिद्दा के।। लाॅकडाउन ने खाया सब हम क्या खाऊँ मुँह को बांध। धूंधली रह गई रात पूनम की करवा में क्या करेगा चांद।। दिन में तारे देखे सौहर बीबी को है चाँद का इन्तजार। कपड़े गहने मेंहदी मेकअप बिन कैसा करवा का त्यौहार।। फीके रह गए करवा जो तो धनतेरस भी फीका होगा। दिवाली की खुशहाली बिन कैसा ‘ विनयचंद ‘टीका होगा।। »

चांद भी फीका पड़ गया

चाँद भी फीका पड़ गया तेरे छत पे आने के बाद। सूरज भी नभ में ढक गया जुल्फ घटा लहराने के बाद।। कोयल भी सुनकर मौन है तेरे सरगम गाने के बाद। ‘विनयचंद ‘ सब पा लिया एक तुझको पाने के बाद।। »

एक ******कवि बना दिया

मुझको निगोड़े ने न सोने दिया। डी जे बजाया और भँगरा किया।। रात भर मुझको न सोने दिया। बड़ी मुश्किल से थोड़ी- सी आँखें लगी। ख्वाब में भी आए और एक सूई लगी।। ख्वाब को भी न उसने पूरा होने दिया।। रात भर मुझको न सोने दिया।। सुबह हो गई यूँही जाग जागकर। फिर भी कहीं गया न वो भागकर।। नींद छाई थी अँखियों में न ढोने दिया।। रात भर मुझको न सोने दिया।। एक हाथ मोबाइल और दूजे में चाय का प्याला। लेकर चुस्की एक सावन क... »

गुलाब मत देना

तुम अपने मुहब्बत का हिसाब मत देना। अबकी वेलेंटाइन पे यारा गुलाब मत देना।। फूल तो देना मगर काँटों का घाव मत देना। खुली आँखों में अधूरा कोई ख्वाब मत देना।। »

अँखियों में समन्दर

दिल दरिया है तेरा तो मेरा भी कोई सरोवर नहीं। झाँक के देखो तो इन अँखियों में समन्दर मिलेगा।। »

बापू तुम्हारे सपनों को हम साकार करेंगे

बापू तुम्हारे सपनों को हम साकार करेंगे। हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।। मूल मंत्र जो दिया आपने, सत्य अहिंसा का सबको। अपनाऐंगे हम जीवन में, जीवन को साकार करेंगे।। हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।। पहले सेवा करूँ पिता का और माता का मन से। फिर जन-जन का सेवक बनकर परोपकार करेंगे।। हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।। तन-मन को हम निर्मल... »

महात्मा गांधी

महात्मा गांधी सत्य अहिंसा को अपनाकर जीवन को साकार किया। एक वस्त्र में खुद को रखकर जन जन का उद्धार किया।। बाल्य काल में शिक्षा सेवा योग मार्ग को अपनाया। जन हितकारी न्याय के खातिर देश विदेश में पधराया।। जननी जन्मभूमि का प्यार दिल में हर पल भरा रहा। कष्ट बथेरे सहकर भी सेवा पथ पर अड़ा रहा।। कर्मशील योगी के आगे हार फिरंगी भाग गया। आजाद हुआ भारत अपना नवजीवन अब जाग गया।। तनय कर्मचंद का मानो काल के आगे हा... »

आज झुकाओ अपना माथ

गांधीजी और शास्त्रीजी का जन्मदिन है एक साथ। सम्मान में इनके विनयचंद तू आज झुकाओ अपना माथ।। »

कविता अपनी राजदुलारी

किसी ने पूछा पंडितजी क्यों लिखते हो आखिर कविता। क्या कुछ हासिल होता है या फिर यूँही रहे हो समय बिता।। छन्द हमारा पिता बन्धुओं और भाषा अपनी जननी प्यारी। बेशक तुकबन्दी हो अपनी पर कविता अपनी राजदुलारी।। »

फेसबुक के चक्कर में

सदा सड़क पर बांध के मुखरा घूमने वाली मैं थी जिसका घुटन भला क्यों हो रही आली घूंघट में ,क्या कारण इसका? बेपर्द बनाया जग ने मुझको या दोषी हूँ खुद हीं इसका ? सिर से आंचल कैसे हट गई तन मन कब बेपर्द हुआ? मान घटा या बढ़ गया अपना अपनों को कुछ दर्द हुआ। फेश बुक के चक्कर में सब रिश्ता बेपर्द हुआ।। »

नदी सुहानी पानी बिन

सागर-सी गहराई बिन। नदी सुहानी पानी बिन।। नाच के हाथी नहा रहा था। और जहाज भी आ रहा था।। बूटा-बूटा पत्ता -पत्ता गिरिवर भी हर्षा रहा था। ‘विनयचंद ‘ ले रिक्त घड़ा बीच नदी पछता रहा था।। »

खेलें हम अन्तराक्षरी

सावन के इस मंच पर कवियों का है संगम। सुंदर सुहानी संध्या में छोड़ें कुछ सरगम।। दो पद हम लिखते हैं दो पद तुम भी गाओ। खेलें हम अन्तराक्षरी निज कवित्त सुनाओ। »

तिलक तुम्हारी माया नगरी

तिलक तुम्हारी माया नगरी बदनाम हो रही है। नशा नग्नता गुण्डागर्दी अब सरेआम हो रही है।। चोरों का आतंक नगर में -डर नहीं लगता । ठगों के गिरोह डगर में – डर नहीं लगता।। ड्रग्स का सेवन दिन रात करे पर – डर नहीं लगता। खरीद फरोख्त दिन रात करे पर – डर नहीं लगता।। अर्द्धनग्न होकर नित रहना- डर नहीं लगता। रोज रोज नव मित्र बदलना – डर नहीं लगता।। डर तो तब लागे जब जय जय श्री राम हो रही है। त... »

सितारों की दुनिया

सितारों की दुनिया में कैसा नशा छा रहा। दिल ने आदर्श बनाया मन ठगा जा रहा।। जन- जन ने हीरो बनाया था जिसको वही आज कैसे ड्रग के लिए मरे जा रहा।। »

राष्ट्र कवि के जन्मदिन पर

हिन्दी साहित्य के कर्णधार हे हे प्रकाशपुंज नक्षत्र हे दिनकर । हे राष्ट्रकवि आजादी के योद्घा रामधारीसिंह के जन्मदिवस पर।। पद पंकज में दे पुष्पांजलि हम प्रणमति शीश झुकाते हैं। हिन्दी के साहित्य उपासकों हम मुबारकबाद फरमाते हैं।। »

कर प्रतिकार

दोष तुम्हारा क्या है अबले तुम काहे को घबड़ाती हो। मिले दण्ड अब उन दोषी को जो तुझको हर पल तड़पाती हो।। मर जाओगी खुद जाओगी बस अपनी हस्ती मिटाकर। तेरे जगह कोई और आएगी बन काठ की पुतली चाकर।। ‘विनयचंद ‘क्या ऐसे कभी खतम हो जाएगा अत्याचार। हे अबले तू सबला बनकर हार न मानो कर प्रतिकार ।। »

संसद और सिनेमा

संसद साहित्य और सिनेमा । सत्य और संस्कार का है खेमा।। पर्दे और पुस्तकें सब कल्पनाओं का संसार है। कल्पना कहाँ दुनिया में सत्य का ही एक प्रसार है।। संसद के शिक्षित व संस्कारी नेताओं का देख कारनामा। मन पर चोट लगे हैं ऐसे जैसे ज़िन्दगी हो एक सिनेमा। हमने बेकार को वोट दिया। बेकार ने हमको लूट लिया।। बेकारी से हम सब मरते वो लड़ते श्वान समान। काटना नोचना फाड़ना और पटकना मेज मचान।। गलती अपनी थी बस इतनी हमन... »

मन्दिर के भीतर

मुझे मिले नहीं भगवान हाय, मन्दिर के भीतर। मैं बना रहा नादान हाय, मन्दिर के भीतर।। मातु-पिता सच्चे ईश्वर हैं क्यों न तू पहचान करे। जन्म दिया और पाला-पोषा पल-पल हीं कल्याण करे।। सेवा बिना नहीं उनके सब दुखिया है संतान हाय, जंजाल के भीतर।। मुझे मिले नहीं भगवान हाय मन्दिर के भीतर।। गणपति को देखा जाके तो दिखा मातु -पिता की भक्ति। देखा जो श्रीराम प्रभु को दिखी चरण अनुरक्ति मातु-पिता को दे सम्मान बने जगत ... »

मेरे मन के कोने में

तुम बिल्डर हो उम्र में इल्डर हो हो सके तो मेरे मन के किसी कोने में अपना घर बना लो। वीरान -सा छाया है हर तरफ यहाँ पर अपने प्यार का सुंदर -सा शहर बना लो।। »

पिया कहल चोरन

शिव गिरिजा संग आए घूमने पृथ्वी लोक में एक बार। कहीं पे देखा झगड़ा -झंझट और कहीं पे देखा प्यार।। पति -पत्नी की जोड़ी कोई झगड़ रहे थे आपस में। छींटाकसी और गालियों से माहौल गरम था आपस में।। सुन गिरिजा के मन में आया क्यों न पूछूँ महादेव से। पति से गाली सुनकर भी कोई कैसे रहती प्रेम से।। उऽऽमा तुम्हें क्या लेना इससे फिर कभी बतलाऊँगा मैं। घूम-घाम घर आकर गिरिजे ले आओ कुछ खाऊँगा मैं।। क्या महादेव आप भी भां... »

शिक्षा की चौपाल

शिक्षा की चौपाल लगी कहाँ रहे अब पढ़ने वाले। संभावित प्रश्नों को रटकर कागज पर हीं बढ़ने वाले।। कई तरह के बोर्ड यहाँ हैं हर भाषा हैं माध्यम के। अंग्रेजी में काम करे सब डाले अचार माध्यम के।। होमवर्क नहीं बच्चे करते । शिक्षक भी न डण्डे रखते।। शासन का जब कहना इतना पास करे सब पढ़ने वाले।। शिक्षा की चौपाल लगी कहाँ रहे अब पढ़ने वाले।। नब्बे पे उत्तान खड़े बस झुके हुए पैंतालीस वाले। नम्र बने बिन का विद्या ... »

कब तक हिन्दी………. भयभीत

हिन्दी के व्याख्याता एक बोल रहे थे सेमिनार में। हिन्दी का प्रसार हो जन-जन और सरकार में।। बजवाई खूब तालियाँ बात- बात पे मञ्च से। समय खत्म होते ही बेमन आए मञ्च से।। खूब अनोखे भाषण थे मस्त महोदय खाओ पान। आप सरीखे हो सब तो निश्चय हिन्दी का कल्याण।। टन-टन टन-टन घण्टी बज गई तत्क्षण उनके खीसे से। हलो डीयर हाउ आर यू बाहर आए बतीसे से।। निहार रहा था केवल मैं सुनकर उनकी बातचीत। ‘विनयचंद ‘बतलाओ कब... »

जंगल में दाने

कबूतरों का झुंड एक उड़ रहा था आकास में। बीच झाड़ियों के बहुत दाने पड़े थे पास में।। युवा कबूतर देख-देख ललचाया खाने के आश में । बोल उठा वो सबके आगे उतर चलें चुगने को साथ में।। ना ना करके बूढ़ा बोला यहाँ न कोई है जनवासा। जंगल में दाने कहाँ से आए इसमें लगता है कुछ अंदेशा।। क्यों दादा तू बक-बक करते खाने दो हम सबको थोड़ा। जल्दी -जल्दी चुगकर दाने आ जाएंगे हम सब छोरा।। बात न मानी किसी ने उसकी उतर के आ गए... »

अह्लाद मिलेगा

ज्ञान के पथ पर विवाद मिलेगा। प्रेमी बनकर देख अह्लाद मिलेगा।। »

भीतर शमशाद है

बाहर विषाद है भीतर शमशाद है । अंतर्मुखी हो जाओ आली फिर देखो प्रसाद हीं प्रसाद है।। »

सावन :एक परिवार

सावन की बहार है कविताओं की बौछार है। कवियों और कवयत्रियों का पावन ये परिवार है।। »

मुस्कुराहट

जहाँ मुस्कुराहटों की दौर है। अन्यत्र कहाँ अपना ठौर है।। »

एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया

एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया। तुम कपटी हुई , उससे धोखा किया ।। नारी तो होती है ममता की मूरत। क्या तुझको नहीं थी उसकी जरुरत।। ज़िन्दगी के बदले मौत का तोफा दिया। एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।। अमर सुधा रस का तुम में है वास। फिर क्योंकर जहर को बनाया रे खास।। मित्र भी गए मित्रता भी गई पाक रिश्ते को तूने बदनाम कर दिया।। एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया। »

जौहरी

खुदा ने पत्थर को वनडोल बनाया। दम है उस जौहरी में जो अनमोल बनाया।। »

घर में डाॅन

मीच के आँखें रोते -रोते खोज रहा हूँ होकर मौन। मुझको रुलानेवाला जग में छुपकर बैठा आखिर कौन? नजर भला वो आए कैसे घर में बैठा बनकर डाॅन ।। »

हँसते -रोते देखा

पाकर सब नदियों का पानी सागर को खूब मचलते देखा। पत्थर के कलेजे रखनेवाले हिमालय को पिघलते देखा।। गम्भीर बड़ा आकाश मगर हमने उसको भी रोते देखा। सबको पाक करे जो नदियाँ बीच कीचड़ में सोते देखा।। ‘विनयचंद ‘ इस दुनिया में किसी को हँसते -हँसते देखा। और किसी को रोते -रोते देखा।। »

गुरुवर के प्रति

मान हैं सम्मान हैं देश की जान हैं। आम नहीं खास नहीं राष्ट्र निर्माता हैं शिक्षक। नाक से नेटा टपक रहा था। आंसू का कतरा लुढक रहा था। बाहुपाश में भरकर जिसने अपनाया वो मेरे भाग्यविधाता हैं वही ज्ञान के दाता हैं।। ऐसे शिक्षक गुरुगरीष्ट को वन्दन है बारम्बार। भूलोक से स्वर्गलोक तक खुशियाँ मिले अपार।। गुरुवर आपके चरणों में कोटि-कोटि नमस्कार ।। »

शिक्षक दिवस पर विशेष

हृदय के गुहा में सघन था अंधेरा ज्ञान की ज्योति जलाकर मिटाया। लगते भैंस बराबर जो थे उसका सम्यक अक्षर बोध कराया।। मूढ़मति को निज कृपा दृष्टि से ज्ञान जगत में मान दिखाया। पिला के अमृत ज्ञान का मुझको चिरजीवी संग अमर बनाया। ऐसे शिक्षक गुरुवर को ‘विनयचंद ‘दिल से अपनाया।। »

देश गान

माँ तुम्हारे चरणों को धोता है हिन्द सागर। बनके किरीट सिर पे हिमवान है उजागर।। माँ….. गांवों में तू है बसती खेतों में तू है हँसती गंगा की निर्मल धारा अमृत की है गागर।। माँ…. वीरों की तू है जननी और वेदध्वनि है पवनी हर लब पे “जन-गण” कोयल भी ” वन्दे मातराम् ” निश-दिन सुनाए गाकर।। माँ…. विनयचंद ‘बन वफादार निज देश के तू खातिर। तन -मन को करदे अर्पण क्या है ... »

पत्थर का दिल

पत्थर का दिल कभी पिघलता नहीं इसलिए तो इसमें गुमान भी नहीं होता। तभी तो इसकी पूजा होती, हर घर में नित सम्मान हीं होता।। »

महफिल सजाए बैठे हैं

कब से तुम्हारी राह में नजरें बिछाए बैठे हैं। चले भी आओ कि महफिल सजाए बैठे हैं।। »

पत्थर से पंगा मत लेना

दोष नहीं दर्पण का थोड़ा सदा सत्य दिखलाता है। कपटी क्रूर कपूत घमण्डी दर्पण को दोषी कहता है।। सत्य असत्य के चक्कर में पत्थर से पंगा मत लेना। देख ‘विनयचंद ‘सीसा हो तुम इसको मत भुला देना।। »

पकड़ मत कान री मैया

पकड़ मत कान री मैया कसम कुण्डल की खाऊँ मैं। शिकायत कर रही झूठी कहानी सच की बताऊँ मैं ।। करूँ क्यों मैं भला चोरी घर में हैं बहुत माखन। नचाती नाच छछिया पे चखूँ मैं स्वाद को माखन।। चूमकर गाल को मेरे करती लाल सब ग्वालन। छुपाने को इसी खातिर लगाती मूँह पे माखन।। सताई सब मुझे कितना तुझे कैसे बताऊँ मैं? पकड़ मत कान री मैया कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।। शिकायत कर रही झूठी कहानी सच की बताऊँ मैं।। चराए शौख से कन्... »

माखन की चोरी

मनमोहक छवि मनमोहन की और मनहर है हर लीला उनकी। आनन्दकन्द आनन्द सबन हित घर-घर चोरी की माखन की।। »

मुक्तक

नहीं आँचल कभी खिसकने दी वो अपने माथ से। आज देख रहे हैं सब उसको होकर यूं अनाथ से।। »

लेटी थी

आज न सुन रही थी न हीं पढ़ रही थी वो केवल लेटी थी। मेरी कविताओं को पढ़कर खुश होनेवाली बहू नहीं वो बेटी थी।। »

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