उदास बाजार में भी खुशी आ जाती है
बेरंग बाजार रंगीन हो उठता है
जब बाजार में बिकने राखी आ जाती है
खुद न आए तो भी उसकी राखी हर साल आती है
भाइयों के चेहरे भी खिल उठते हैं
जब शहर में गांव से बहन की राखी आती है
दूर किसी सैनिक को जब राखी मिलती है
पाँच रुपए के इस लिफाफे में मानो
सिर्फ राखी ही नहीं, खुद बहन भी आती है
ये राखी के धागे भी
किसी ढाल से कम नहीं होते
युद्ध से भाई को सकुशल घर ले आते हैं
ये रेशम की डोर में मामूली धागे नहीं होते
लाख धागे बांध लो कलाई में
वो खुशी नहीं होती
ये खास त्यौहार भी आम सा लगता है उनको
जिनकी कोई बहन नहीं होती
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