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रास्ता हूँ मैं

रास्ता हूँ मैं
युगों युगों से
लोग चलते आये हैं मुझ पर
न जाने कितने पदचापों की
ध्वनि को मैंने सुना है।
न जाने कितनों ने
चल कर मुझ पर सपनों को बुना है,
लोग आते रहे, जाते रहे
नए उगते रहे
पुराने विलीन होते रहे,
आने और जाने का गवाह हूँ मैं
चलती जिन्दगी का प्रवाह हूँ मैं
मैं देखता रहता हूँ
आते-जाते अस्थिर मानवों को
बनती बिगड़ती चाहतों को,
हर तरह की आहटों को।
उनका आना-जाना लगा रहा
मैं स्थिर रहा,
आने पर खुशी और
जाने पर आँसू बहता रहा
पदतलों से दबते-दबते
ठोस बनता रहा,
वे मुझे निर्जीव समझते रहे
मैं उन्हें अस्थिर समझता रहा।

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