4 Comments

  1. आने और जाने का गवाह हूँ मैं
    चलती जिन्दगी का प्रवाह हूँ मैं
    ____रास्ते का मानवीकरण बहुत ही खूबसूरती से किया है सतीश जी आपने।……”आने पर खुशी और जाने पर आँसू बहता रहा
    पदतलों से दबते-दबते ठोस बनता रहा,’ बहुत सुंदर शिल्प,कथ्य और ख़ूबसूरत भावनाओं के साथ बेहतर प्रस्तुति। उम्दा लेखन

  2. “.वे मुझे निर्जीव समझते रहे
    मैं उन्हें अस्थिर समझता रहा।”
    वाह वाह क्या बात है पाण्डेयजी। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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