रास्तों का कष्ट उस

रास्तों का कष्ट उस मुसाफिर को क्या
जिस मुसाफिर ने इसे जीवन पथ समझा
जिनकी मंज़िल ही उलझी बैठी हो
उसने कब जीवन का मतलब समझा
रास्ते चाहे सुलझे हो या उलझे
कब रास्तों ने किसी को है अपना समझा
जितनी गहरी होती है खाई देखने में
उतना ही खौफ उसमे भरा समझा
मेरे पैरो तले जमीं पर थी उसकी नज़र
जिसे उम्र भर मैंने अपना रहनुमा समझा
ठोकर पत्थरों की हो या फूलों की
हर शख्स ने इसे अपनी किस्मत समझा
कल की बात हो या आने वाले कल की
वक़्त की चाल को किस ने अब तक समझा
राजेश’अरमान’

Comments

2 responses to “रास्तों का कष्ट उस”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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