रिश्ते

रिश्ते ना गहरा सागर हैं
ना जल माटी की गागर हैं
वे तो बस बहता दरिया हैं
जीवन जीने का ज़रिया हैं

कुछ रिश्ते तुम्हारी क़िस्मत हैं,
कुछ रिश्ते तुम्हारी हसरत हैं,
पर हर रिश्ता रूख़ मोड़ता है,
कहीं, कभी, दम तोड़ता है।

कुछ रिश्तों ने तुम्हें राह दिया,
कुछ रिश्तों ने बस आह दिया,
कुछ रात से थे, पर सहर लगे,
कुछ अमृत थे, पर ज़हर लगे।

हर रिश्ते ने, भिगोया है,
कुछ सींचा है, कुछ बोया है,
न जाने कितने रिश्तों में,
भीगे, डूबे, हो किश्तों में।

पर जीवन के, अंतिम क्षण पर,
चंद बूँदों से, भीगे तन पर,
रिश्तों का रस छन जाएगा,
जब एक सूखा तन जाएगा।

Comments

3 responses to “रिश्ते”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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