वो औरत

करे हैं काम वो इस धूप में जलती सी इक औरत,,,
गमों को झेल लेती है सभी, गहरी सी इक औरत।।।

बडों का मान रखती है झुकी रहती है कदमो में,,,
कि रिश्तों के दरख्तों पे लगी टहनी सी इक औरत।।

थकी जाती है सारे दिन घरों के काम में लेकिन,,,
सजन के वास्ते पल में सजी सवंरी सी इक औरत।।

सभी इल्जाम दुनिया ने इसी पर थोप रक्खे हैं,,,
खड़ी रहती है दरवाजे पे वो सहमी सी इक औरत।।

चटकती धूप में सबके लिए रोटी बनाती हैं,,,
जला देती है अपने ख्वाब वो सुलगी सी इक औरत।।।

Comments

3 responses to “वो औरत”

  1. Abhishek kumar

    Nice

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