ताउम्र तलाशती रहती थी आॅखियाॅ जिनको
वो ना मिला मुझे पूरे जहान् में
जब पलकों को गिराकर ध्यान लगाया श्याम की सलोनी सूरत का
फिर धीरे से उठाई पलकों की चिलमन
तो श्याम सुंदर की छवि नयनन मैं बस गई
महबूब क्या होता है तुम्हें क्या मालूम
तुम तो सिर्फ एक लेबल हो मेरे नाम के
तुम्हें क्या पता घर कैसे चलता है
क्यों नयनों के ।तीर चलाते रहते हो
इतने भी ना करो सितमगर सितम्बर हमपर
कि सितम भी कम पड़ने लगे
उसने कहा चांद मेरा है
मैंने कहा चांद मेरा है
उसने कहा चांद तो एक है
मैंने कहा फिर कहाँ से तेरा है
प्रस्तुति – रीता अरोरा
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