सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं।
पता नहीं कब से यूँ ही जल रहा हूँ मैं।।
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तुमसे मिलने की ख्वाहिशें दम तोड़ चुकी।
फिर भी हर दिन घर से निकल रहा हूँ मैं।।
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मौसम मिज़ाजी हवाओ सी फितरत वाले।
तुमने कहा भी कैसे की बदल रहा हूँ मैं।।
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ऐतबार करने का सिला ही हमको मिला है।
ऐसी चोट लगी आज तक संभल रहा हूँ मैं।।
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दरिया समंदर तूफान क्या क्या नहीं देखा।
एक हौसले की कश्ती थी जो चल रहा हूँ मैं।।
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साहिल उम्र भर किया है कैसा सफ़र हमने।
मौत आई फिर से सफ़र पे निकल रहा हूँ मैं।।
@@@@RK@@@@
सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं”
Comments
4 responses to “सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं””
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bahut khoob
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Thanks
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वाह बहुत सुंदर
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सुन्दर रचना
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