सब अच्छे बुरे का

सब अच्छे बुरे का मैं दोषी नहीं सब कुछ तय है
फिर मेरे होने का मुझे ही क्यों हर पल भय है/
मैं फिर क्यों इस चक्र के चलने रूकने का भागी हूँ
आत्मा शरीर के इस खेल में क्या मैं त्यागी हूँ /
नहीं होता मैं तो क्या कुछ अंश अंश से न्यून हो जाते /
जब तुम मुझमे हो तो क्या मेरे अंश कभी शुन्य हो जाते /
हर छन मेरे होने और न होने का बोध साथ रहता है
अहंकार, मोह माया वासना और क्रोध साथ रहता है /
आप सतगुणो के स्वामी और पूजनीय होते है
आपका अंश होकर भी हम निंदनीय होते है
इन अंशों के अनुपात पर मन आपसे र्विचार चाहता है
बस यही बस प्रभु आपसे उपकार चाहता है /
बस यही बस प्रभु आपसे उपकार चाहता है /

राजेश ‘अरमान ‘

Comments

3 responses to “सब अच्छे बुरे का”

  1. Abhishek kumar

    👏👏

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