सवेरे

सवेरे ही सवेरे हों ,मुसीबत के
अंधेरे में ,
मित्रता-सूर्य की किरणें ,बिखर जाएं,
अंधेरे में।
जानकी प्रसाद विवश

Comments

One response to “सवेरे”

  1. Abhishek kumar

    Good

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