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हँसते -रोते देखा

पाकर सब नदियों का पानी
सागर को खूब मचलते देखा।
पत्थर के कलेजे रखनेवाले
हिमालय को पिघलते देखा।।
गम्भीर बड़ा आकाश मगर
हमने उसको भी रोते देखा।
सबको पाक करे जो नदियाँ
बीच कीचड़ में सोते देखा।।
‘विनयचंद ‘ इस दुनिया में
किसी को हँसते -हँसते देखा।
और किसी को रोते -रोते देखा।।

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