पाकर सब नदियों का पानी
सागर को खूब मचलते देखा।
पत्थर के कलेजे रखनेवाले
हिमालय को पिघलते देखा।।
गम्भीर बड़ा आकाश मगर
हमने उसको भी रोते देखा।
सबको पाक करे जो नदियाँ
बीच कीचड़ में सोते देखा।।
‘विनयचंद ‘ इस दुनिया में
किसी को हँसते -हँसते देखा।
और किसी को रोते -रोते देखा।।
हँसते -रोते देखा
Comments
11 responses to “हँसते -रोते देखा”
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बहुत खूब, सुन्दर अभिव्यक्ति
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धन्यवाद
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धन्यवाद
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वाह भाई जी प्राकृतिक दृश्य का बहुत ही सुन्दर वार्णन।
लेखनी को प्रणाम।-
शुक्रिया बहिन
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बहुत खूब सर
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लक्षणा का बहुत सुन्दर प्रयोग परिलक्षित हो रहा है, उर्दू “पाक” अरबी “दुनिया”
सहित आम जीवन में प्रचलित शब्दों का सुंदर समन्वय है। उच्चस्तरीय भाव पक्ष है, इस प्रतिभा को प्रणाम-
इतनी सुंदर समीक्षा के लिए धन्यवाद
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अतिसुंदर कविता
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Awesome lines
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