क्यों ना!
क्षितिज के पार ….जाल डाल…. खींच ले वह आलौकिक नजारा,
जहां बसे ग्रह नक्षत्रों का खेल …..बना देता हम सबको बेचारा।
जब चाहा जिसे चाहा एक झटके में वो काटा!!
डोर जिससे बंधा था हर जीव … जीव से परमात्मा।
ना उम्र का तकाजा ना बीमारी का ठिकाना,
हंसता खेलता इंसान भी हो जाता प्रभु को प्यारा।
फिर किस लिए बनावट फिर किस लिए दिखावा,
सीधा हो या जटिल हो,
हर रस्ता वही पे जाता।
निमिषा सिंघल
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