हाथ की रेखाएं न बदनाम कर डालो
कुछ नज़र अपने करम पर भी डालो
तेरा वज़ूद खड़ा एक गुनहगार सा
क्या हर्ज़ खुद को कातिल समझ डालो
तीर तरकश से निकल कब लौटे है
अब कोई तीर बेवज़ह यूं न निकालो
खानाबदोश से फिरने से हासिल क्या
कोई वज़ह जीने की तो बना डालो
वाइज के पास रहने दे बाते उनकी
मज़हब से अब सब परदे हटा डालो
है कौन सी वो तरकीब ‘अरमान’
जो खुद को फिर इन्सां बना डालो
हाथ की रेखाएं न बदनाम कर डालो
कुछ नज़र अपने करम पर भी डालो
राजेश ‘अरमान’
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