हिकारत

तुम्हारी हिकारत
गहरे पङे जख्म को
हरा-हरा कर जाते हैं
उपेक्षित किसी और के ख़ातिर
मेरे रूह तक को वेध जाते हैं ।

Comments

2 responses to “हिकारत”

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

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