अनसुनी करके सबकी बात लक्ष्य हमेशा रखना याद।। इल्म ऐसा तुझमें आए तेरी मंजुलता सबको भाए हर सङक पर, हर गली में हरेक जन की हो ये फ़रियाद अनसुनी करके सबकी बात लक्ष्य हमेशा रखना […]
अनसुनी करके सबकी बात लक्ष्य हमेशा रखना याद।। इल्म ऐसा तुझमें आए तेरी मंजुलता सबको भाए हर सङक पर, हर गली में हरेक जन की हो ये फ़रियाद अनसुनी करके सबकी बात लक्ष्य हमेशा रखना […]
कयी जिम्मेदारी है “ऐ आत्मजा” तुम पर हासिल करना है तुझे छिपा जो क्षितिज पर। लगन जगाना है कुछ ऐसा मशाल बन जाए वो वैसा मिशाल मिल न पाए तुझ जैसा अनुसरण करें तूं बढ़े […]
गर कोई मुझसे पूछे कभी बता मन तेरा बसता है कहीं झट से मैं बोल दूं मगधेश की गौरवमई परम्परा समेटे है जहां बस वहीं।। भोले भाले लोग जहां के मेहनत नस नस में है […]
सखि बनती नहीं क्यूं दुश्मन बन जाती है क्या बताऊं नारी ही नारी के काम नहीं आती। अपनी बात को मनवाने के लिए कितने झूठ सच कहा सहारा उसने लिए अहम तुष्टि की खातिर,क्या-क्या कर […]
गुम कर दिया तेरे प्यार में पर फिर भी यही सवाल रहा क्या करती हो मेरे लिए। छोङ दिया अपनी पसंद भूल गयी क्या था नापसंद भुला बैठी खुद के अस्तित्व को फिर भी सवाल […]
हम जो भी हैं मात तात के बल पे हैं जुङी बहुत-सी उम्मीदें हमारे कल से हैं जन्मदाता ही नहीं, हमारी हर पहचान उनसे है हमारी आजीविका, रूतवा, हर मुकाम उनसे है रहते जहां उनकी […]
अंगुली पकङ चलना सिखाया गिर-गिर कर संभलना सिखाया मुश्किलों में भी हंसना सिखाया भय-स्नेह से सही-ग़लत में भेद बताया हर दांव-पेंच को समझना सिखाया इस जीवन से परिचय करवाया मुझे इस धरा पर इक पहचान […]
आपने बहुत किया हमारे लिए काबिल बनाया, जी सकूं, न सिर्फ़ अपने लिए काम आऊं, कुछ कर पाऊं मैं, आपके लिए सहारा बनके नहीं,साथ रहूं आपके पनाह के लिए आसरा मेरी नहीं, मैं आकांक्षा रखूं […]
विरासत जिन्दगी की मिली है जो हमको समझ पाने में अक्षम कैसे बतलाये तुमको। खुली हवा में जीना स्वचछ सांस लेना निर्मल था पानी उसे भी हमने छीना वारी बिक रही है वायु बिक रहे […]
हर एक की अपनी मजबूरी है पर उसको समझना जरूरी है। जरूरतें बहुत है, पर साधन सीमित है आकांक्षाओं की परिधि तो असीमित है। समझना पहले है, समझाना अगली कड़ी में शामिल है, बनाने वाला […]
जब कोई जरिया मिलता नहीं ग़म छिपाने का। हमराज दिखता नहीं दर्द मिटाने का। बेचैनी हद से ज्यादा आसरा नहीं तकल्लुफ मिटाने का। बरबस मन की पीर अश्क बन छलक आती, है सौख नहीं आंसू […]
ढूंढता है उन लम्हों को जहां सिर्फ अपनापन था अधिकार मां पर सिर्फ अपना नहीं दबाव किसी का था।। जहां हक था भाई से बातें करने की पिता से लाङ जताने की मां के आंचल […]
जब-तक सांस मेरे तन में रहे तेरे हाथों में हाथ मेरा हो हर उम्मीद जुङी हो तुमसे बस हर क्षण तेरा साथ हो।। उम्मीदों की सहर हो या ढलती उम्र की शाम हो समय का […]
उसे भी वो जख्म मिलें जो उसने थे दिए कुछ पल ही सही हर वो लम्हा जिए जो थे मेरे लिए बुने। अपने हक़ के लिए किस तरह तङपना मेरा सब कुछ होकर भी कुछ […]
अपनी की गई गलतियों से सबक लेके, खुद की कमियों को चिन्हित करना मैंने सीख लिया । हासिल करने के लिए ख्वाबों का होना जीने के लिए एक मक़सद होना अपनी दुआओं में सबों को […]
ज़मीं से आसमां का फासला तय होता मौत के घर का पता सबको पता होता। न डर होता किसी के खोने का कोयी छाया ऐसा, नशा होता। मुस्कराहट होती बस हरेक चेहरे पर न खौंफ […]
तलाश करने जो चले सुकून के पल घूमकर आ गये वहीं जहां से चले होके बेकल। मन में भी सुकून नहीं फिर ढूंढते फिरते कहां जीवन पे ही छाया ग्रहण छिनती सांसों की गिनती कहां […]
अकसर ये ख्याल उठते जेहन में रात तूं किधर ठहर जाती पलक बिछाए दिवस तेरे लिए तूं इतनी देर से क्यूं आती।। थक गये सब जर-चेतन थका हारा है सबका मन आने की तेरी आहट […]
समूची इंसानियत के हक-हकूक की बात ऊंचे-ऊंचे ओहदे पर आसीन जनों की असली औकात भुला पाना आसान नहीं। बदतरी में बेहतरी तलाशने की नाकाम कोशिश क़ातिल पंजों की पकड़ से निकलने की कोशिश भुला पाना […]
हरदम शिकायत तूं मुझे माना करती कहां निमकी-खोरमा छिपा के रखती कहां भाई से ही स्नेह मन में तेरे यहां रह के भी तूं रहती कहां। जब भी कुछ बनाती, आंखें छलक आती तेरी गर […]
अपने लोक की ये कथा है, अपनी मां धरनी बसुन्धरा है निज सुत की करनी से दुःखी हो व्याकुल हो त्राहि-त्राहि करने लगी वो तब उसने तप का लिया सहारा त्रिलोक के स्वामी को जाके […]
बेटी और बेटे में इक फर्क समझ में आया ससुराल में रहकर भी मैके का साथ निभाया। दूर रहकर भी मनसे ममत्व नहीं मिट पाया पास रहकर भी यह पुत्र समझ नहीं पाया। पुत्र को […]
आज कयी बच्चों के एक पिता को दवा के अभाव में तङपते देखा है ना उसके भूख की चिन्ता न परवाह उसकी बीमारी की गज़ब दास्तां है, बुढ़ापे की लाचारी की। बिस्तर पर पङे, पर […]
सुनने को कर्ण यह तरस गये कहां अब कोई अच्छी ख़बर है वेवसी का आलम है यह कैसा पल यह कैसा,हर एक की सूनी नज़र है।। सुनने को अंन्तर्मन यह तरस रहा है कहीं से […]
अपनी कश्ती खुद ही चला कर दिखदो मंजिल को पास ले आकर नहीं कुछ भी ऐसा जो तेरे बस में नहीं हैं कर सकते हो, बढ़ो बस ये अहसास जगाकर। आसान से गर मिल ही […]
हिम किरीटनी, हिम तरंगनी, युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता है ऋणि हम,करते है अर्पित श्रद्धा-सुमन, साहित्यअकादमी से विभूषित,शोभित पद्यभूषण तेरा यश है फ़ैला, क्या भू-तल क्या गगन।। परतंत्रता के दर्द को दिखाती रची […]
आज वही दिन है जब मेरी मुझसे पहचान हुई मुझमें भी है लेखन क्षमता इक नई खूबी की आभास हुई मेरे अल्फ़ाज़ मेरी ख़ामोशी की आवाज़ बने इक नई सुबहा हुई नयी उम्मीदों से मुलाक़ात […]
आसान बहुत है चाह अच्छा बनने की पाल लेना पर तय सफर पर बढ़ते रहना,बङा ही कठिन है आस किसी के मन में जगाकर, खुद के घर की रौनक घटाकर, पर हित में इच्छा को […]
ख़ुद पर ऐतवार कर पर भूलकर भी न किसी पर विश्वास कर। खुद के ही बल पर अपने जीवन की रूपरेखा तराश कर।। कब कोई अपना,अपनी अंगुली को घुमा,तोहमत तुझपे लगा देगा तेरी हर जायज़ […]
बता तो दो क्यू तुम ऐसे हो, मेरे होकर भी परायों से कमतर हो। यक़ीनन दोष हममें, दुनियादारी की बूझ नहीं आकलन करें कैसे, रिश्ते- नातोंकी समझ नहीं साफ़ कहने की आदत, सुनने की हिम्मत […]
यह जीवन मेरा रहा है समर्पित हां बस तुम्हारे लिए। अपनी इच्छाओं के पंखों को अपने ही इन दोनों बाजुओं से टुकड़ों में बांट बिखेरा है हमने हां बस तुम्हारे लिए। अरमान मेरे ना गगन […]
हे भारत कोकिला! मुबारक हो तुम्हें जन्मदिन तुम्हारा। वतन के लिए कर खुद को समर्पित जीवन तेरा स्वतंत्रता को अर्पित हैदराबाद में जन्मी अघोरनाथ की सुता कहाई माता दी कवयित्री निज रचना की लोङी सुनाई […]
दूर तलक तनहाई का आलम अकेली बिरह वेदना सहती ख़ामोशी की गहरी चादर ओढ़े चुपचाप रहती है रात। किसको अपनी पीङ सुनाए कैसे उसको अपना मीत बनाए जिसके लिए कयी ख्वाब सजाए उधेड़-बुन में रोती […]
आइना पूंछता है ********** यह सवाल हर रोज मानती क्यूं नहीं सलाह मेरा । चेहरा वही है क्यूं वक्त जाया करती है मेरा निखार आएगा कैसे वही पहली सी फितरत है तेरा ज़िद […]
ईमेल, चैटिंग ही अपना भविष्य क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ? नववर्ष का कार्ड नहीं प्रेमपत्र लेखन स्वीकार नहीं कलम कागज का जमाना बना अतीत विशेष क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ? क्या […]
देख लिया दुनिया तुझको अब और नहीं कुछ चाहत है, हर तरफ चेहरे पर एक चेहरा है अपनों से ही हर जन आहत है। अब और फरेब की गुंजाइश नहीं यहां अपनापन की लगी नुमाइश […]
अपनी तमाम विषमताओं के साथ अनगिनत विविधताओं के बावजूद सबसे माकूल व्यवस्था है अपना गणतंत्र। इस बदलते समय की बस यह मांग है लोक के प्रति तंत्र की सहिष्णुता और तंत्र के प्रति लोक की […]
अब हम हैं स्वतंत्रत देखो यह अपना गणतंत्र। ७२वी वर्षगांठ में भी देखो उमंग, कहां से लाया कैसा मंत्र यह अपना गणतंत्र। देख के इसका रूप सलौना पाक तरस रहा,चीन रचता षड़यंत्र यह अपना गणतंत्र।
यह दर्द मेरा लिखा है जिसपर नाम तेरा ढूँढे जो कोई हमदर्द बेदर्द में शामिल नाम तेरा। सही अगर तुम हो नाम, गलत होगा किसका धर्म के पथ पर चलने वाले कर्महीन सही होगा नाम […]
धैर्य का दामन टूट रहा प्रभु फिर देखो न किस्मत रूठ रहा। अपना यहाँ है कौन यहाँ तू चुप क्यों बैठे देख रहा। सब्र नहीं अब मुझमें है सोच के मन में हैरत है कैसे […]
कार्य हमारे मन के अनुरूप हो थोङी सी छाया ना सिर्फ धूप हो। हम सही मायने में कार्य उसे ही कहेंगे जिससे कोई सकारात्मक परिणाम का आभास मिलें । हमारे कार्य का एक मकसद हो […]
15 जनवरी की पावन तिथि, सेना दिवस है आज चलो शपथ ले, कल पर छोङे न कोई काज। आत्मनिर्भर बनें, परनिर्भरता का करें त्याग नयी नीति से करें आने वाले पलों का आकाज । अपने […]
मकरसंक्रांति अलग अंदाज लिए, हर प्रान्त में, अपनी छटा बिखेर रहा । सूर्य चले उत्तरायन हो छटा नव आशा की किरण बिखेर रहा । सकारात्मकता का संदेश लिए अपनी संस्कृति, अपनी परिवेश की झलक बिखर […]
आँखों में खटकती, फ़िर दिल में कैसे रहती जद्दोजहद में गिर गिरकर मैं पग रखती खुद ही खुद से हारी कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी । फ़िजाओ के रूख़ -सा मिज़ाज तेरा बदला फिर […]
बेरंग हुआ उसका जीवन, रूप बदलकर स्याह हुआ । लाल रंग से टुटा नाता, दूर सोलहो श्रृंगार हुआ ।। बिछोह हुआ उस प्रीतम से जिससे उसका ब्याह हुआ । जिसने पहनाया था चूङा जिससे शुरू […]
खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन। महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।। दमक उठे जीवन जिससे वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ ! उपवास करे जो रब का उस व्रती की मैं […]
नुपुर तुम्हारी शोभा नहीं ज्ञान को अंगीकार करो शक्ति रूप तुम धर कर के पाश्विक प्रवृत्ति का संघार करो। सिर्फ सदन तक तेरी शोभा नहीं विशाल गगन तुम्हारा आँगन है अपने आकांक्षाओं को पंख लगा […]
क्यूँ इन्सान के चेहरे पर नकाब चढ़ा ऐसा की कोई अपना ही दगाबाज बन कर निकला । सूरत देखकर गैरो पे भरोसा करना अपने पैरों को जले तवे पर रखना अपनेपन से चढ़ा खुमार, कहाँ […]
ऐ वक़्त ढूँढ लायेंगे तुम्हें । खो दिया उन क्षणों को कयी स्वप्न सुनहले पलते थे खौफजदा उन पलक को जिनमें ख़ौफ के मंज़र तैरते थे विलखती आत्मा में आश की ज्योत जलाने को ऐ […]
कुछ खो सा गया था इक दूरी जब बन सी गयी थी पुनः खुद को समेटा टूटकर बिखर सी गयी थी। फिर से आपने जो हौसला बढाया निखरने की कोशिश में क़दम मैने बढाया यह […]
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