Suman Kumari's Posts

रूपरेखा

ख़ुद पर ऐतवार कर पर भूलकर भी न किसी पर विश्वास कर। खुद के ही बल पर अपने जीवन की रूपरेखा तराश कर।। कब कोई अपना,अपनी अंगुली को घुमा,तोहमत तुझपे लगा देगा तेरी हर जायज़ कोशिश को भी, तेरी ही गलती बना देगा अकेले ही रहने की आदत डाल, न अपनी भावनाओं से खिलवाड़ कर।। देखो कैसी अजब घङी यह आई है, अपनों से ही अपनेपन की लङाई है, न स्वार्थ है फिर भी क्यूं ये खिंचाई है मन है सूना- सूना, पलकें मेरी पथराई हैं ख्वाइश... »

बता तो दो

बता तो दो क्यू तुम ऐसे हो, मेरे होकर भी परायों से कमतर हो। यक़ीनन दोष हममें, दुनियादारी की बूझ नहीं आकलन करें कैसे, रिश्ते- नातोंकी समझ नहीं साफ़ कहने की आदत, सुनने की हिम्मत नहीं पर क्या सारा दोष मेरा,तुम पाक वारी जैसे हों बता दो क्यूं तुम ऐसे हो। अपने जो हैं उनकी बातो पे चिलमन डालना कङवी-से-कङवी लब्ज को हंस के टालना इतना ही सीखें हो, कही बातों का गिरह बांधना ये गांठ बेधते मन को, कोई नासूर जैसे ह... »

तुम्हारे लिए

यह जीवन मेरा रहा है समर्पित हां बस तुम्हारे लिए। अपनी इच्छाओं के पंखों को अपने ही इन दोनों बाजुओं से टुकड़ों में बांट बिखेरा है हमने हां बस तुम्हारे लिए। अरमान मेरे ना गगन को चुमू इस धरा पर, तेरी होके जी लूं आश में खुद को तराशा है हमने हां बस तुम्हारे लिए। कभी साथ लेकर कहीं चलने में तकलीफ़ थी मुझे साथ रखने में अपनी तौहीन तुझी से सहा है हमने हां बस तुम्हारे लिए। तुझे सबसे ज्यादा चाहा है हमने तेरी स... »

भारत कोकिला

हे भारत कोकिला! मुबारक हो तुम्हें जन्मदिन तुम्हारा। वतन के लिए कर खुद को समर्पित जीवन तेरा स्वतंत्रता को अर्पित हैदराबाद में जन्मी अघोरनाथ की सुता कहाई माता दी कवयित्री निज रचना की लोङी सुनाई पालना में जिनकी गुन्जती हो बांग्ला कविता पश्चिम तक गुंजायमान था स्वर तुम्हारा हे भारत कोकिला! मुबारक हो तुम्हें जन्मदिन तुम्हारा। मानवाधिकार की संरक्षक, गोविराज की भार्या किंग्स कौलेज लंदन में जिसने शिक्षा पा... »

रात तू अकेली नहीं

दूर तलक तनहाई का आलम अकेली बिरह वेदना सहती ख़ामोशी की गहरी चादर ओढ़े चुपचाप रहती है रात। किसको अपनी पीङ सुनाए कैसे उसको अपना मीत बनाए जिसके लिए कयी ख्वाब सजाए उधेड़-बुन में रोती रात। देखो ये कोयल क्यूं ‌ कूके तुझसे भी क्या प्रीतम रूठे तू भी है विरहा ‌की मारी खुद से ही बातें करती रात। »

आइना पूंछता है

आइना पूंछता है ********** यह सवाल हर रोज मानती क्यूं नहीं सलाह मेरा । चेहरा वही है क्यूं वक्त जाया करती है मेरा ‌ निखार आएगा कैसे वही पहली सी फितरत है तेरा ‌ ज़िद का आवरण कुछ छाया है ऐसा अच्छाइयों पर लगा बादल घनेरा । कुमकुम से रौनक आएगी कब तक अंन्तर्मन में छाया हो शक का बसेरा । »

स्मृति शेष

ईमेल, चैटिंग ही अपना भविष्य क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ? नववर्ष का कार्ड नहीं प्रेमपत्र लेखन स्वीकार नहीं कलम कागज का जमाना बना अतीत विशेष क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ? क्या बस गोल वृत को काले-नीले से भरकर पूर्ण करन ही इसकी जिम्मेदारी हस्ताक्षर करने को ढूंढा करते नर- नारी शर्ट की शोभा नहीं मांगने की लगी बीमारी नहीं रह पाएगी यह सर्जनात्मक क्षमता विशेष क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ? »

देख लिया

देख लिया दुनिया तुझको अब और नहीं कुछ चाहत है, हर तरफ चेहरे पर एक चेहरा है अपनों से ही हर जन आहत है। अब और फरेब की गुंजाइश नहीं यहां अपनापन की लगी नुमाइश है ढिठता की हद पार किए दिखती ‌नही‌ शरमाहट है। »

अपना गणतंत्र

अपनी तमाम विषमताओं के साथ अनगिनत विविधताओं के बावजूद सबसे माकूल व्यवस्था है ‌अपना गणतंत्र। इस बदलते समय की बस यह मांग है लोक के प्रति तंत्र की सहिष्णुता और तंत्र के प्रति लोक की समझदारी लोक से परे लोक का उल्लघंन तंत्र की नाकामी की‌ ओर बढ़ता कदम कैसे कहें माकूल व्यवस्था है अपना गणतंत्र। अपनी है चुनौतियां, जो अपनों के द्वारा दी गई पङोसी बेख़ौफ़ देख हमें दम्भ से मुस्करा रहा अपने इस संघर्ष से हौसले दु... »

यह अपना गणतंत्र

अब हम हैं स्वतंत्रत देखो यह‌ अपना गणतंत्र। ७२वी वर्षगांठ में भी देखो उमंग, कहां से लाया कैसा मंत्र यह अपना गणतंत्र। देख के इसका रूप सलौना पाक तरस रहा,चीन रचता षड़यंत्र यह अपना गणतंत्र। »

उजालो पे हो अख्तियार तेरा

यह दर्द मेरा लिखा है जिसपर नाम तेरा ढूँढे जो कोई हमदर्द बेदर्द में शामिल नाम तेरा। सही अगर तुम हो नाम, गलत होगा किसका धर्म के पथ पर चलने वाले कर्महीन सही होगा नाम तेरा। मेरे आश की हर कलियाँ जुङकर फूल बनने को आतुर तेरे सिवा कोई चाह नहीं हर उम्मीद पे है लिखा नाम तेरा। शिकायत की कोई चाह नहीं यह दम निकले कोई आह नहीं ढूँढ रहे चैन, मिले कहीं ठौर नहीं अब खुशी कहीं है और नहीं तिमिर मेरे, उजालो पे हो अख्ति... »

दामन धैर्य का

धैर्य का दामन टूट रहा प्रभु फिर देखो न किस्मत रूठ रहा। अपना यहाँ है कौन यहाँ तू चुप क्यों बैठे देख रहा। सब्र नहीं अब मुझमें है सोच के मन में हैरत है कैसे कोई किसी के हिस्से की रोटी लूट रहा। या कोई कर्ज मुझपे पूर्व का शेष था जो इस जन्म में चुकाते मौन खङा तू देख रहा । फिर क्यूँ इन पलकों पर अश्रु की बुन्द ढलक आए तेरी रज़ा जब तक न हो कैसे भाग्य विधाता रूठ रहा । हर दर्द तुझी से भेंट मिले तुझसे ही ठेस म... »

कार्य हमारे मन के

कार्य हमारे मन के अनुरूप हो थोङी सी छाया ना सिर्फ धूप हो। हम सही मायने में कार्य उसे ही कहेंगे जिससे कोई सकारात्मक परिणाम का आभास मिलें । हमारे कार्य का एक मकसद हो हमारा यह मकसद हमारे ह्रदय को अथाह आनंद से सराबोर कर दे। कर्म वही करें जो मन से पसंद हो वरना हमारे काम जेल में कैदियों से कराये गये कार्य के समरूप हो । »

सेना दिवस

15 जनवरी की पावन तिथि, सेना दिवस है आज चलो शपथ ले, कल पर छोङे न कोई काज। आत्मनिर्भर बनें, परनिर्भरता का करें त्याग नयी नीति से करें आने वाले पलों का आकाज । अपने दुश्मनों को ताकने का अवसर न दे हौसले मुकम्मल न हो, आए अपनी हरकतों से बाज । उनकी बढती ताकतें, हममें प्रतिद्विन्ता लायें नहीं कर कुछ ऐसा कि उन्हे अपनी करनी पर आए लाज। हथियारों की दौङ में मुब्तिला रहना उचित नहीं अंगीकार हो काट की रणनीति, देखा... »

मकरसंक्रांति आई

मकरसंक्रांति अलग अंदाज लिए, हर प्रान्त में, अपनी छटा बिखेर रहा । सूर्य चले उत्तरायन हो छटा नव आशा की किरण बिखेर रहा । सकारात्मकता का संदेश लिए अपनी संस्कृति, अपनी परिवेश की झलक बिखर रहा । यह पर्व है धरती पुत्रों का उनकी पौरूष, त्याग्, मेहनत की अद्भुत गाथा बिखेर रहा । इस दिन को मनाने की परंपरा आधुनिकता के दौर में भी प्राचीन छवि को बिखेर रहा । पतंगो को धागे से जोर थामें मन से हर रिश्ते की डोर सभ्यता... »

सहधर्मिणी तुम्हारी

आँखों में खटकती, फ़िर दिल में कैसे रहती जद्दोजहद में गिर गिरकर मैं पग रखती खुद ही खुद से हारी कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी । फ़िजाओ के रूख़ -सा मिज़ाज तेरा बदला फिर भी धैर्य के संग ठहरा रह मन पगला लेके उम्मीद सारी, कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी । अपेक्षाओं के मोतियों से,गुथी आशाओं की माला तुम्हे भली जो लगे, उस रूप में खुद को ढाला छोङी चाह प्यारी, कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी... »

बेजान हुआ यह जीवन

बेरंग हुआ उसका जीवन, रूप बदलकर स्याह हुआ । लाल रंग से टुटा नाता, दूर सोलहो श्रृंगार हुआ ।। बिछोह हुआ उस प्रीतम से जिससे उसका ब्याह हुआ । जिसने पहनाया था चूङा जिससे शुरू परिवार हुआ ।। कालचक्र का तान्डव,सिन्दूर,आलता बेजान हुआ । बीच भंवर में नाता टूटा, सारा जीवन बेजार हुआ ।। गभी बारात ले धुमधाम से,सजी थी महफ़िल शाम की। शहनाई की धुन बजी थी, बनी थी मैं जब आपकी ।। कभी हल्दी सजी थी जिन हाथों में, उनके ना... »

मैं, मैं न रहूँ !

खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन। महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।। दमक उठे जीवन जिससे वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ ! उपवास करे जो रब का उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ ! सिंचित हो जिससे मरूभूमि उस सारंग की धार बनूँ ! दिव्यांगता से त्रस्ति नर के कम्पित जिस्म की ढाल बनूँ ! मैं, मैं ना रहूँ, हारे- निराश हुए मन की, आश बनूँ ! बिगत वर्ष में में जिनका अबादान मिला कृतज्ञता ज्ञापित, उनकी मै... »

ऐसा श्रृंगार धरो

नुपुर तुम्हारी शोभा नहीं ज्ञान को अंगीकार करो शक्ति रूप तुम धर कर के पाश्विक प्रवृत्ति का संघार करो। सिर्फ सदन तक तेरी शोभा नहीं विशाल गगन तुम्हारा आँगन है अपने आकांक्षाओं को पंख लगा कर्मठ बन, खुद का निर्माण करो। सृजन की बीज की धात्री हो तुम तपस्विनी हो, नहीं सिर्फ मातृ तुम खुद की निर्मात्री भी बनने को हर रूढ़िवादिता का तिरस्कार करो। अवनी सी धीर, तू धरते आई व्योम से भी रिश्ता जोङ आई हर क्षेत्र में... »

नकाब चढ़ा हर चेहरे पर

क्यूँ इन्सान के चेहरे पर नकाब चढ़ा ऐसा की कोई अपना ही दगाबाज बन कर निकला । सूरत देखकर गैरो पे भरोसा करना अपने पैरों को जले तवे पर रखना अपनेपन से चढ़ा खुमार, कहाँ गहरा निकला। कभी किसी को संदेह से नहीं देखा हमने अपने तो क्या गैरो को भी ना परखने की कोशिश की हमने समझा था कंचन जिसे, वो तो अयस निकला। मन चाहे कुछ ऐसा यहाँ कर दे उन जैसों की असलियत सामने रख दे फिर आँख न उठा पाए किसी पे पर हिम्मत नहीं, अहम्... »

ऐ वक़्त

ऐ वक़्त ढूँढ लायेंगे तुम्हें । खो दिया उन क्षणों को कयी स्वप्न सुनहले पलते थे खौफजदा उन पलक को जिनमें ख़ौफ के मंज़र तैरते थे विलखती आत्मा में आश की ज्योत जलाने को ऐ वक़्त ढूँढ लायेंगे तुम्हें । याद कर उस पल को पटरियों पर जब थककर चूर थे थकान से मदहोश होकर निन्द में मशगूल थे निन्द से यम के दर का सफ़र क्या राज़ है जानने को ऐ वक़्त ढूँढ लायेगे तुम्हें । कयी दिनों तक भूख से बिलबिलाते होंठ सूखे, पेट सटक... »

दीप आश की

कुछ खो सा गया था इक दूरी जब बन सी गयी थी पुनः खुद को समेटा टूटकर बिखर सी गयी थी। फिर से आपने जो हौसला बढाया निखरने की कोशिश में क़दम मैने बढाया यह कोशिश कामयाब होगी उत्साहीन सी हो मैं गयीं थीं । एक मंच यह ऐसा मिला है जहाँ अनजानों से हौसला बढ़ा है फिर से अनजान रिश्ता बना है ना शिकवा यहाँ न कोई गिला है यह सफ़र हमारा ऐसे ही का चलता रहे आप के सानिध्य में फूलता- फलता रहे दीप आश की, दिख रही, जो बुझ सी ग... »

बात बन ही जायेगी

बात बन ही जायेगी इस सोंच के साथ कदम बढ़ाते जा रहें हैं नभ हमारा होगा कभी इस उल्लास के संग क्षितिज की ओर कदम-दर-कदम बढ़ते जा रहे हैं »

महामना

हे महामानव महामना, श्रद्धान्जली ज्ञापित है तुझको! काशी हिन्दू विश्विद्यालय के प्रणेता बहुआयामी प्रतीभा के धनी, शत-शत नमन् है तुझको तुझ जैसों से ही पुष्पित हो मेरी प्यारी ज़मीं! विराट व्यक्तित्व से सुशोभित ओजस्वी वाणी से थे धनी उनके द्वारा स्थापित मर्यादाओं को पूरा करना है हमें यहीं! स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं महान् पंडित शिक्षाविद् स्नेहिल आत्मीय मार्गदर्शन पथप्रदर्शन कर रहीं! »

निराशाओं का भंवर

हौसला रखकर चलना होगा परिस्थिति हमेशा इसतरह कहाँ रह पाएगी । कबतक दर्द से नाता रहेगा कहाँ तक निराशाओं का यह भंवर सहमाएगी। कठिनाई के ये दिन जाते-जाते भी सकारात्मकता की सीख हमें दे जाएँगी । ये तकलीफ़े जो वक्त से मिले हैं हमें एक नयी सोंच से परिचय मेरा करवायेगी । धीरज के ये तिनके समेट कर रखें हैं हमने आने वाले अच्छे दिनों की जो नन्ही- सी आश जगायेगी । »

दु:खों से नाता

दु:खो से उबरना क्या इनसे तो जन्मों का नाता है मीठा तो कभी-कभी नमकीन साथ निभा जाता है । ज्यादा मीठा हो तो मन जल्दी ही उब जाता है नमकीन के बल पर ही मीठा भी रास हमें आता है । सुख की घङियो में इन्सान खुद को भूल जाता है दु:ख की दारूण वेला ही इंसान को औकात बता जाता है । मन में यह बेचैनी क्यूँ क्यूँ मन जार-जार हो जाता है दर्द का सैलाब क्यूँ आँखो में अकसर उतर आता है । सुख की चाह नहीं दु:ख से आह क्यूँ निकल... »

वो प्रीत कहाँ से लाऊं

जिन्दगी की सरगम पर गीत क्या मैं गाऊँ तुम्ही अब बता दो वो प्रीत कहाँ से लाऊँ। पतझङ सी वीरानी छायी है जीवन में ना कोई है ठिकाना खुशी अटकी है अधर में दो राहे पर खङी मैं किस पथ पर मैं जाऊँ तुम्हीं अब बता दो वो प्रीत कहाँ से लाऊँ। नज़र में जो छवि थी कभी राधा मैं बनीं थीं कान्हा की लगन मन में लगी थी उसकी हंसी भी वैरन सी खङी थीं विश्वास की डोर टूटी दुनिया ही जैसे लूटी झूठ के भँवर से कैसे निकल पाऊँ तुम्ही... »

अटलजी

आपकी दूर दृष्टि से भारत निखर कर शिखर की ओर बढ़ चला है आपका दिखाया सपना साकार होने का समय है आने वाला। महानता की प्रतिमूर्ति भारत को महान बनाने का उन्होंने प्रण लिया था सबको चुनौती देकर पोखरण परीक्षण कर, परमाणु दे डाला । बसुन्धैव कुटुंबकम् की पुरानी नीति भारत की रही है उसी नीति पर अटल की सरकार चल रही थी दिल्ली से लाहौर तक मित्रता का पाठ सिखा डाला । »

श्रद्धान्जली

आपके चरण कमल में करती हूँ श्रद्धांजली अर्पण भारत माँ के प्रति आपके प्रेम का कर पाएगा कौन वर्णन । जन्म दिवस है वर मांगती हूँ मैं मुझमें भी भाव हो आपके जैसा मन में हो मेरे आपसा समर्पण । भारतीय जनसंघ को नवरंग से भरकर बिखरते दलों को भाजपा का रूप देकर दिखलाया निज दर्शन । रचयिता बने उस दल का वतन को शिखर पर पहुँचाया कभी कवि हृदय ने मौत को भी चुनौती देके आया वरणीय है आपका तर्पण । »

क्रिसमस आया

नभ में उमंगो का गुलाल छाया देखो ना, क्रिसमस आया । कोई अपना किसी से रूठे ना कहीं किसी अपने का साथ छूटे ना हर तरफ़ खुशियाँ हो, आश टूटे ना अपना, अपनों का विश्वास लूटे ना अपनी कमियों का अहसास आया देखो ना, क्रिसमस आया । किसी की उदासी का, न सवब बन जाऊँ न किसी का बुरा हो, भाव मन में मैं लाऊँ आलस न करूँ काम हमेशा सबके आऊँ जहाँ भी जाऊँ, बस खुशी की गीत मैं गाऊँ फिर से उम्मीदों को पंख निकल के आया देखो ना, क्... »

अच्छे से जान लो

सराफत है हमारी मज़बूरी का मत नाम दो जहाँ सिर्फ तुमसे चलता नहीं यह अच्छे-से जान लो।। हैं बहुत से लोग जिनका तुमसे होगा पुराना वास्ता उनकी चाहतें तुमसे जुङी हो तुम तक जाता हो उनका रास्ता पर मेरी मंजिल तुम नहीं यह अच्छे-से जान लो।। बहुत सारे लोग ऐसे हमसे जुङी है दासताँ उनके खातिर हूँ समर्पित बस उन्हीं से अपना राब्ता शेष अपनी ख्वाहिश नहीं यह अच्छे-से जान लो।। »

हक़दार क्यूँ नहीं

प्यार न सही प्यार के बोल क्यूँ नहीं चाँद अपना न सही चाँदनी के हकदार क्यूँ नहीं ।। दूर बहुत हो तुम जिन्दगी में संग नहीं साथ हो यह कम अनमोल तो नहीं ।। »

उन्हीं से मात खातें हैं

जिन्हें हम दिल में रखते हैं उसे क्यूँ बता नहीं पाते हमें स्नेह है कितना कभी उनसे जता नहीं पाते । उम्मीदों के बीज मन में पाल कर क्यूँ रखते वजूद नहीं जिनका उन्हीं से मात हैं खाते। ख़बर खुद को भी नहीं रहती मन किधर किस रास्ते पर हैं भटकने की ख़बर जो हमें होती ठोकर लगने से पहले ही संभल जाते । यह जहाँ हसीन लगती थी कभी हमको कभी गजलों से अपनी भी पटती थी पर शब्दों के मोती कहाँ खो से गये हैं अकेले हम हैं अब... »

बन निडर

छोङ न अपनी लगन में कोई कसर दुनिया देखती रह जाएं मेहनत का असर, साहसी बन तू तू हो निडर हाँ यू हीं हो तू प्रगति पथ पर अग्रसर । »

कैसी वेबसी

ये कैसी बेबसी है नाराज़गी को ढो रहे हैं अक्षमता को आकने के बदले दूसरे की कमियों को गिन रहे हैं । ये दिन है कैसा ना उम्मीदों का आसिया है ख़्वाहिशों के जलने की चुपचाप मातम मना रहे हैं । हर दुआ अपनी जो कभी कबूल हो गयी थी उन मन्नतो से ही अपने अपनों से ज़ुदा हो रहें हैं । हर साँस में जिनकी ख़ैरियत की ही दुआ आ रही थी वही गैर से बनकर इल्जामो की झङी लगा रहे हैं । किसको कहे अपना अपना कहाँ अब है कोई अपने ही... »

बिटिया भयी परायी

बिटिया हुयी परायी ************* ना तुम भूलोगे ना हम हाँ, यह बंधन छूटे ना, मरते दम। यह पावन वेला, अश्रुओं की इसमें जगह नहीं नवरंग भरेंगे इसमें, निराशाओं की ठौर नहीं हंसकर कर पदार्पण, दूर हुए हैं हम। नवजीवन की नववेला, यही है जीवन का खेला बचपन की गलियां छूटी, परदेश की है हर बेटी कर सर्वस्व समर्पण, तेरे दर पर छूटे दम। यह रीत किसने है बनायी, बिटिया क्यूँ है परायी पाल-पोसकर इसको, अनजानों के संग धर आई कर... »

आया भी नहीं

जिसे पाया भी नहीं जो खोया भी नहीं उसके होने ना होने का संताप आया भी नहीं । न मन का कोई कोना हुआ बगैर उनके सूना पीङ न हुआ उनबिन दूना पश्चाताप आया भी नहीं । »

आदत से मजबूर

ऐसा नहीं कि हम तेरे करतूतों से अनजान हैं पर शिकायत किससे करें अपनी आदत से हम लाचार हैं । चाहते हैं बदल दे खुद को जवाब दे हर बेअदली का परेशा हैं समझा के खुद को अपना ही अरि बनने को तैयार है । जनमो-जन्म तक संग चलने को संग रह, हर तंज, हंस के सहने को जीवन ही नहीं, जिन्दगी के बाद भी साथ देने का वादा बेअंजाम है । »

सतरंगी यादों के संग

सतरंगी यादों के संग देखे रंग बिरंगे स्वप्न कयी पावस के छाये में दिखा जो दिनकर फिर से पली उम्मीद नयी »

बदल पाते

दिन अगर बदल सकते पुनः अपने बचपन में लौट पाते । फिर से पापा की नन्हीं परी बन चार पैसे की नेमचुस खरीद लाते। घर की चौखट पे बैठे, बाट देखती चाचू की, पटाखो के संग घरकुल्ला खरीद लाते। धान के नेवारी तले, पिल्ले को रख गभी उसकी भूख की चिंता कभी ठंढ से बचाने का डर भैया के संग मन से निकाल आते। ना अपनों के दूर जाने की फिक्र मिले फिर वो लम्हा जो हो दुनिया से इतर पुनः विश्वास की ज्योत जगा पाते । अपनों का बदलना ... »

तिमिर बढ़ती जा रही

अवसाद के बादल घिरे पर तुम न आये प्रिये यह तिमिर बढ़ती जा रही बुझे हर उजास के दिये । आक्रोश है या ग्लानि इसे नाम दू कैसे खुद ही मौत का दामन थाम लूँ मकबूल नहीं यह शर्त हमको कयी मुमानियत जो हैं दिये । »

मझधार

हमें बस जीवंत बोध की दरकार है नहीं मुझे खुद पर, हाँ तुझपर एतवार है हम सजग प्राणी भले हैं पर स्वार्थ से सना अपना प्यार है । स्वार्थ से रचा-बसा राब्ता यह बस नाम है अनुराग का राफ्ता-राफ्ता उधङती गयी धज्जियां अवशेष खुद का अहंकार है । तादम्यता का दामन थाम के समझौते के बल पर जो बसा स्नेह का नामो-निशान नहीं डर-डर के रहे फिर भी टकरार है । हर क़दम को फूक -फूक कर रखा बढने से पहले खुद से कहा कबतक यूँ सहते रह... »

भ्रम का दामन

सफलता और असफलता के कयी पङाव देखे हैं हमने हार और जीत के कयी अनुभवों को जीये हैं हमने । फैसले लेने के मुकाम पर साहस दिखाने का हौसला सही निर्णय लेने की जद्दोजहद में भ्रम का दामन थामा है हमने । मिली हार एक ग़लत फैसले से उससे रूबरू होते आ रहे हैं अपनी ही हार का खुद ही जश्न मनाये हैं हमने । हतोत्साहित हुए पर जिम्मेदारियों से भागे कहाँ खुद से हार कर तन्हायी का दामन थामा है हमने ।। »

क्यूँ

यह जख्म कोई नया तो नहीं फिर दर्द का अहसास इतना गहरा क्यूँ ? कयी सितम अपनों ने किये पर उफ ना आज तक हमने किये अबतलक जो बेधते लब्ज़ असर कर न सके तेरे लव से सुनते ही हम सह न सके तुझसे मिले अलफाज दे गया सदमा क्यूँ ? पल-पल चोट मिलते रहे शिकायतें करने की फितरत नहीं कहने को बहुत कुछ हमको मिला कुछ और पाऊँ ये हसरत नहीं बढ़ते जा रहे कदम-दर-कदम खत्म होता नहीं रास्ता क्यूँ ? »

नन्ही

मेरी नन्ही परी तू हमसब की खुशी । खुश रहना हमेशा कहाँ कोई तेरे जैसा । हम सब हैं तुझसे मगन है तेरी खुशियों की लगन। तू निरन्तर आगे बढ़े हैं सफलता तेरे आगे रहे । सही गलत की पहचान तू कर सके तेरे कीर्तिमान से ये नभ झुक सके । तेरे जन्मदिन की बधाई देने हम सब हैं आये हम ही नहीं ये सितारे भी हैं मुश्काये। तू जुग-जुग जिये हर बुलन्दी को छुएअ! »

कृषक

कृषि हमारे वतन की रीढ़ कृषकों के श्रम से कौम का पेट भरता है । पर इनकी उपेक्षाओ से क्यूँ ना हमारे प्रतिनिधियो का दिल दहलता है । सङको पर इनका विरोध प्रदर्शन अन्नदाताओ की समस्याओं का संकेत देता है । इनकी दयनीय स्थिति हमारी लापरवाह नीतियों का आभास देता है । विश्वास जगाने की जगह बलप्रयोग कर, नजरअंदाज तानाशाही का संकेत देता है । »

महापर्व

विविध आबम्बरो से दूर, श्रद्धा-आस्था से सरावोर महापर्व है छट्ठ, जन-गण है उपासक, आराध्य है दिनकर! »

सूर्य उपासना

हम आधुनिक होते जा रहे हमारी आस्था आज भी वही हम उपासको के लिए सूर्य परिक्रमण कर रहा पृथ्वी है स्थिर। दर्शाता रह पर्व लोक-आस्था विज्ञान पर है भारी सदियो से प्रारम्भिक रूप मे सूर्य उपासना है जारी। लोकगीतो मे चलते-चलते सविता थककर अस्त हो गयी पुनः उठकर अपनी स्वर्ण आभा से प्रकाशित जग को कर रही। सदिया गुजर गयी कयी बदलाव आ गये है पर आझ भी दिनकर को लङुआ-पकवान भा रहे है। देशी हस्त निर्मित वस्तुओ का उपयोग कर... »

खोते अपने

जिसे अपना मानते आये हर बात पर, नुक्श निकालने को आमदा , देखते ही देखते ये कैसे बेगाना हुआ । दर्द जब हद से बढ़ा दिल पर बोझ बढने लगा बोझिल सा यह मन अश्क पलकों को भिगोने लगा देखते ही देखते ये कैसे बेगाना हुआ । »

करूँ बस अपने मन का

हर रीति रिवाज से परे करूँ बस अपने मन का। मन कहता मेरा जो अपमानित करते मेरे जननी जनक का । उनकी पहुँच से दूर कहीं ले जाऊँ करूँ बस अपने मन का। कैसी खटास यहाँ घिर आई है हर रिश्ते में दूरियाँ उभर आई है उसमें मिठास घोल दू अपनेपन का करूँ बस अपने मन का। सहनशीलता तुम्हारा आभूषण धीरता से सीचते आई घर- आँगन खोते जा रही आपा अपना दोष है उम्र के अंतिम पङाव का करूँ बस अपने मन का। »

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