Suman Kumari's Posts

इन्तज़ार

कहाँ कभी ऐसा किसी ने सोंचा था एक पीङित, शव से विस्तर साझा करेगा। यह प्रकृति का कहर, या बढती आवादी की लहर जिन्दगी और मौत, जैसे संग-संग, गयी हो ठहर। एक तरफ शान्त, बिना हलचल किए बंद, निश्चिंत पङी, रूकी किसी अपने के इन्तज़ार में , आ कर, कर दे शायद, मेरा अंतिम संस्कार दूसरी तरफ़, डर-दर्द से पीङित, सहमी बंद पलक शान्त, पर मन में छटपटाहट लिए आए कोई अपना, मुझे राहत दिलाए इस जा चुके, मेहमान के आगोश से, बाहर... »

शुमार

आदतों में कहाँ ये शुमार है अपनों के लिए जगह नहीं बस औरों के लिए प्यार है । आपकी अदा है आपका अपना यह सारा जहाँ बस गैरो की खातिर अपने से ही टकरार है । »

रस्साकशी

तुम्हारे और मेरे रस्साकशी में पीस कर रह गये अरमान हमारे तुम भी अपनी मर्जी के मालिक समझे न जज़्बात हमारे । पर अब और नहीं खुद पर गैर को हावी होने देंगे अपने हक पर किसी और को न शामिल होने देंगे । »

टीस

सवाल और गम के थपेडों के बीच पिसकर रह गये मेरे रूह और जिस्म समझने की कोशिश में, समझते- समझते सारी ख्वाहिश स्वाहा, बस मन में अवशेष है टीस »

हिकारत

तुम्हारी हिकारत गहरे पङे जख्म को हरा-हरा कर जाते हैं उपेक्षित किसी और के ख़ातिर मेरे रूह तक को वेध जाते हैं । »

उजास

सब संभव हो यदि हम पूरे मन से चाह ले क्या नहीं बस में है अपना जो खुद की क्षमता जान ले राह निकल ही आए, घनघोर अंधेरे में भी, जो उम्मीद का दामन थाम ले । जीजिविषा जगाये मन में कुछ ऐसा करतें जायें थके नहीं अब कभी भी यूँ उम्मीद की उजास जगाये भटक ना पायें अब हम चलो ईश्वर का दामन थाम ले । »

जीवन दायिनी

हे माँ! तू जीवनदायिनी । तू है माँ इस जग की माता, तेरी ममता हर कोई पाता तुमसे है हमसब का नाता पुत्र कुपुत्र सुने हैं भव में पर तू तो है वरदायिनी, हे माँ! तू जीवनदायिनी । तू तो है सौम्यता की मूरत निष्ठुरता कहाँ तेरी फ़ितरत करूणा वरसाती तेरी सूरत तेरी महिमा अंकित थल-नभ में तू तो है करूणामयी कल्याणी, हे माँ! तू जीवनदायिनी । मानवता की तू निर्मात्री पर यह कैसा संकट है मात्री तेरे रहते बिलखे क्यू धात्री ... »

याद का दीपक

कुछ ऐसे भी लम्हे जीवन के जिनके याद का दीपक जलता है घोर तिमिर की खायी में जो प्रकाश बन राह दिखाता है । मन बोझिल हो जब जाता है नहीं पास नजर कुछ आता है ऐसे निराशाओं की बेला में जिनके याद का दीपक जलता है । »

करूणा बरसा जाओ

हर हर महादेव अब संघार बहुत हुआ थोङी सी करूणा बरसा जाओ। कहलाते हो औघरदानी तुम सन भला कौन विज्ञानी इस व्याधी से, हर परेशानी से मानवता को निजात दिला जाओ । देख तेरे सुत बिलट रहे हैं कण-कण को वे तरस रहे हैं जीजिविषा है जीने की पर मौत के मुँह में सरक रहे हैं निराधार हैं, आधार दिला जाओ थोङी सी करूणा बरसा जाओ। »

निर्णय तुम्हारा

दूर रहकर जीवन यापन करने का फैसला तुम्हारा था मैंने तो बस साथ निभाया, सम्मान किया, जो एकतरफा निर्णय तुम्हारा था। ये खामोशी जो घर बना ली है हम दोनों के दरमियां इसकी बहाली भी तुम्हारी है मुझे ये भी अजीज है तोफा दिया तुम्हारा था। तेरी छोटी सी भी ख्वाहिश को सहेज के रखना, ये खुबियाँ हमारी है कही गयी कङवी बातों को विस्मृत कर देना, ये तेरी नज़ाकत है रिश्तों के हुए हैं जो तार-तार ये उत्तमता तुम्हारा है । »

बताओ तब तुम कहाँ थे

जब मुझे कयी सवालों के घेरे में रखा जा रहा था, जिनका क़ोई वजूद नहीं आते जाते अंगुली उठा रहे थें बताओ तब तुम कहाँ थे।। जब मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी तेरी छाँव में भी थी सिर पर धूप घनेरी पग-पग पर, पङे थे जब चुनौती समाज के पैमाने पर थी उतरने की कसौटी बताओ तब तुम कहाँ थे।। »

पहचान बताते रहना

जो दिखता नहीं पर हर घङी अपने होने का आभास हमें कराता है । जैसे ही गर्वित हो बहकने को होते हैं एक हल्की सी चोट दे रास्ता बताता है । इसी तरह करूणा की ज्योत जगाए रखना हे प्रभु! भटकने से पहले सही की पहचान बताते रहना! »

अजन्मे भ्रुण की व्यथा

मेरी अभिलाषा को थोड़ा-सा उङान दे दो हे तात! मुझे मेरी पहचान दे दो कबतक भटकती रहेगी मेरी आत्मा यूँ करते रहोगे, कहाँ तक मेरा खात्मा मुझको मेरा, खोया मुकाम दे दो मेरे हौसलों को थोड़ा-सा उङान दे दो । तुझको जना, वो भी किसी की कली थी जिसने राखी बांधा, तेरे लिए वो भी भली थी तेरी भार्या भी किसी तात की परी थी बता फिर मेरी क्या खता, एक एहसान दे दो मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो । जब मैं चलुगी चहकेगा अंगना ... »

अहम् का फासला

अलफाजो का अहम् किरदार रहा हमारी नजदीकियाँ मिटाने में कभी हम कभी अतःम नासमझ बन बैठे दूरियाँ बढाने में । ना मेरी कोशिश रही तुझे मनाने की ना तुम मुझे विश्वास दिला पाये एक मद् का फासला रहा एक- दूसरे को समझाने में । »

कुछ रातें ऐसी होती हैं

कुछ रातें ऐसी होती हैं जो कयी नये स्वप्न दिखाती हैं जिन्हें पाने की मन में जीजिविषा जगाती हैं । कुछ रातें ऐसी भी होती हैं एक अपूरणीय क्षति कर जाती हैं जिसकी वेदना से उठती टीस हर रात जगाती हैं । »

लोकनायक

शत-शत नमन उस जन-नायक को लोकनायक से जाने जाते थे भारत-रत्न से सम्मानित, इंदिरा विरोधी कहलाते थे । आज जन्म दिवस है उनका हम नतमस्तक हो जाते हैं विमल प्रसाद जिन्हें “मानव पिता” कह जाते हैं । सितावदियरा की वह पावन भूमि जहाँ जे.पी . का चेतनत्व हुआ प्रभादेवी के संग, दाम्पत्य का श्रीगणेश हुआ पर घर तक कहाँ वे सीमित रह पाते हैं भारत-रत्न से सम्मानित, इन्दिरा विरोधी कहलाते हैं । आजादी के संघर्षों... »

अगर मालूम होता

तुम्हें खोने का डर एक अनजाने,अनचाहे मुकाम तक पहुंचाएगा खुद को वही रोक लेती अगर मालूम होता हस्र न होता यह अपना । नीचे गिर कर संभलना सीखा था हमने खुद की नजरों से गिरकर न आया संवरना अगर मालूम होता हस्र न होता यह अपना । तमाम अकुलाहटे झकझोरती खुद से तर्क-वितर्क कर निचोड़ती आपसी द्वेष को करें दरकिनार द्वैत का भाव फिर से है तैयार अगर मालूम होता हस्र न होता यह अपना । »

मैं हूँ बेटियाँ

मैं हूँ बेटियाँ, मुझे सभी अपनों का, थोङा नहीं पूरा दुलार चाहिए, अपनी चाहतो को रंग देन, उमंगो के संग, उङने को पूरा आसमान चाहिए । किसी की बुरी नियत का फल, मुझे न मिले, पूरी गरिमा से जीवन का अधिकार चाहिए, मुझे भी उङने को पूरा आसमान चाहिए । मेरी सुन्दरता नहीं, मेरे सद्गुणों का आकलन हो, देखती आँखो में कामुकता नहीं, स्नेह की बौछार चाहिए, मुझे भी उङने को पूरा आसमान चाहिए । बाज़ार की कोई उपस्कर नहीं, देखक... »

पुरसुकून की तलाश में

नित नए विवादों से तंग आकर क्या निकल पङू परसकून की तलाश में । काश कोई करी मिल जाए करार की दस्तखत कर सकें, हर उस मसौदे पर जिसपर सुकून का,आखिरी इकरारनामा अंकित हो अदला-बदली करें अंतर्मन के द्वंद से, क्या मैं निकल पङू, अक्षुण्ण शान्ति की तलाश में भी। संजीदगी लिए कोशिशें, क्या मुकाम को पाएगी धीर हुए मन में,फिर वे स्वप्न क्या सजीव हो पाएंगे बेखौफ़,पूरी गरीमा के साथ, अपनी क्षमता को आकार देने क्या मैं निक... »

पुरसुकून

नित नए विवादों से तंग आकर निकल पङी परसकून की तलाश में । »

भूल गयी खुद को

बनी बनायी राहों पर चलते-चलते भूल गयी खुद को, औरों की सुनते-सुनते । ज़मीर जिसकी गवाही न दे, क्यूँ बढे अबूझ चिन्हों पर अच्छी बनकर, खुद से लङकर, सह गयी डरते-डरते । अपमान का विष, कब तक पान करूँ कब तक मूक-चीख से प्रतिकार करूँ थक गयी, संघर्ष की घङियो से, रार करते-करते । खुद को कैसे मशगूल रखू, कबतक आखिर धीर धरूँ रोजमर्रा की बात है ये,आखिर कैसे वहन यह पीङ करूँ बिखरी आशाओं की लङियाँ, टूट गये सब सहते-सहते ।... »

सब अच्छा होगा

अब तो यह विश्वास भी साथ छोङ रहा “सब अच्छा होगा ” नाउम्मीदी के तिमिर में अब हर उम्मीद भभक रहा क्या पता आगे कौन- सा भरम पलेगा । »

रोता हुआ देख

मुझे रोता हुआ देख शायद तुझे सकूँन मिले मेरे इन आँसूओ की बहती धारा में तेरी रूसवायी का खू मिले । »

कुछ नया तो नहीं

तिल-तिल के जलना, मिलना -बिछङना कुछ नया तो नहीं रोज की बात है । जैसे दिनकर का जाना, संध्या का मुस्काना, गगन धरा के मिलन का भरम कुछ नया तो नहीं रोज़ की बात है । हर सुबह नयी उम्मीदें जगाना रात को, सुनहले पलों के ख्वाब सजाना फिर दैनिक क्रियाकलापों में बिखर कर रह जाना कुछ नया तो नहीं रोज़ की बात है । थोङी- सी और लगन मन्जिल तक पहुँचाती, कुछ ख़ास ख़्वाहिशों की, हर दिन की अनदेखी असफलता दिलाती बगैर ईमानदार... »

शुरूआत कैसे करें

तुम्हीं बताओ कैसे एक नयी शुरुआत करें, तुझे जानकर भी फिर से तुझपर कैसे इन्तिखाब करें । जिनकी फितरत रही हैंअकसर ताश के पत्तों की तरह, जिनकी बातें जल में उठते बुलबुले की तरह , फिर बताओ तुम्हीं कैसे पहले-सी बात करें । टूटे हुए धागों को पहले-सी आकृति देने की कोशिश, पूरी तरह साकार क्या, कभी हो पाई है गहरे घावों के दर्द की भरपाई कहाँ हो पाई है जाते-जाते भी छोङे निशानों से बताओ मुलाकात कैसे करें एक नयी शु... »

आत्मसाक्षात्कार

इक दृढ़ संकल्प के साथ करते हैं इक नयी शुरुआत । संकल्प लेना और उसपर अमल करने को तत्पर रहना फिर देखो होती है कैसे खुशियों की बरसात । सफल होना ही है इस दृढ़ निश्चय को करना है आत्मसात । पहले खुद को तौलते हैं देखादेखी में क्यूँ भागते हैं चलो पहले करले खुद का आत्मसाक्षात्कार । »

रात भर

हमेशा रात-सी खामोशी लिए एक अजीब सी वेचैनी से घिरी- घिरी रहती हूँ । निशा हो या दिवस खुद में ही सिमटी, सूर्य की किरणों से कहाँ मिला करती हूँ । »

वो एहसास हो

तुम वो एहसास हो जिसे सोंचकर मन-मस्तिष्क में आतंक सा जाता है । तुझे सोंच कर इन नयनों में आँसूओ का सैलाब उमङ आता है । »

करने वाला धुआँ हैं

वतन पे मर- मिटने वालों का हस्र क्यूँ ये हुआ है रौशनी तो पा लिए हम पर करने वाले धुआँ हैं हर जवान हिन्द का यह सवाल कर रहा है ? »

तसलीम

क्यूँ हम कृतघ्न ऐसे, मूढ़ बने पङे हैं एक वीरान्गना के कृत्यों को भूल बैठे हैं कोई तो होता, थोङा सा भी तस्कीन देता उनके साथ खङा हो उन्हे तसलीम देता । तस्कीन- ढाढस तसलीम- अभिवादन »

अपना किसे कहे

अंग्रेजी हुकूमत को चकमा दी सेनानियों को बचाने खातिर पति शहीदों में शामिल बम बनाने खातिर घर-वार कर निछावर जेल में पङी थी बाहर आकर, अपना कहे किसे वो अकेले ही जद्दोजहद में पङी थी »

गुमनाम मौत, इन्तिसाब करने वालों की

अपने जीवन के अमूल्य पल, दुर्गा वोहरा सूवा की सुश्रुषा में, इन्तिसाब कर मुमानियत को तोङ, मुल्क के हिफाज़त मे रही जो तत्पर, मिली क्यूँ उन्हें गुमनाम मौत? »

शत शत नमन

पिता बाँके बिहारी इलाहाबाद में नाजीर थे महारानी विक्टोरिया की आस्था में लीन थे ससुर “राय साहब” उपाधि से दे मण्डित आसपास के सभी ब्रिटिशों में आसक्त थे ऐसी ही आव-ओ-हवा में, दुर्गा के हौसले बुलंद थे »

दुर्गा भाभी – 02

अनगिनत वर्ज़नाओ की बंदिशो में, नारी जकङी हुई थी क्रांति की अलख जगाने,धधकती विद्रोह में कुद पङीथी मुखबिर, कभी भार्या बन, वतन का कर्ज चुका रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—- जीवट-भरी थी वो महिला, दुर्गा भाभी थी कहाती जिनके बिना अधूरी, आजादी की दासताँ रह ज़ाती भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव के पनाह दे रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—- वीरों की फाँसी के बदले, दम्... »

दुर्गा भाभी-01

उम्मीद की लौ जल-जल के बुझ रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी परालम्बन भरे जीवन से मुक्ति हमें दिलाने वीर- वीरान्गनाओ की टोली कफ़न बाँध चल रही थी ।। दिन के उजाले में भी, तमस से हम घिरे थे खुद के ही घरों में, हम बंधक बन रह गये थे तब दुर्गा रूपी पुष्प, कौशांबी में, खिल रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी —- “हिंद की अग्नि” से थी जो विभूषित वीरता से अपनी, ब... »

अभ्यर्थना है प्रभु

किसी का आसरा नहीं करूँ मन में दंभ न भरूँ अभ्यर्थना है प्रभु बस तेरे पनाह में मैं रहूँ »

असर

फ़िजाए भी कुछ बदलने लगी शायद असर उसपर भी तेरा छाने लगा »

नसीब

हम तो तेरे मुरीद हैं तुमसे मिले तमस ही मेरे नसीब है »

तफ्तीश

आँखे रोके कहाँ रूकती तफ्तीश में लग जाती हैं छिपे हुए अश्क को पहचान लेती हैं »

“सावन” मंच हमरा

विविध काव्यों से सजा है न्यारा कविवर ने है जिसे संवारा समालोचना की मुखरता से मिलकर सबने जिसे निखारा छन्द- अलंकार की बहती धारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा। बनी एक पहचान हमारी खुद से हुई मुलाकात हमारी जहाँ अपने ही अनछुए पहलू को जाना, समझा और संवारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा । भावों की बहती है अविरल सरिता विविध उदगारों से बनती है कविता हर मुद्दे पे उठते बोल यहाँ पर हर क्षेत्... »

तस्लीम होगी

कब अपनी इबादत “उन्हे ” तस्लीम होगी सभी सुताओ की ख्वाहिशे महफ़ूज होंगी । »

तुम्हारा ख़याल आया हो

कोई ख्वाहिश कहाँ कोई पछतावा भी नहीं पतझङ-सी है वीरानी बसंत आया ही नहीं दूर तक फैला है सूनापन जैसे शून्य निकल आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो । काली निशा की छाया में अर्णव में खामोशी छायी है पर उसके तलचर में सुनामी की तरंगों ने जैसे पनाह पायी हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा खयाल आया हो । »

कुछ इस तरह

बादलों से चाँद जैसे निकल आया हो आके अपनी छटा से सारी गम की परछाई को मुझसे छिपा आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो। »

विकृति

बेटियों के साथ क्यूँ होता यह बार बार मानसिक विचलन है ये कहते जिसे बलात्कार यह सामान्य नहीं क्रूरतापूर्ण व्यवहार है मानसिक विकृति की ओर बढतो की पहचान है »

मिली आजादी तेरे सहारे

बापू हमारे, जन- जन के प्यारे मिली आजादी बापू तेरे सहारे ।। वर्षों से भारत माता सिसक रही थी पाँवो में गुलामी की बेङी पङी थी दिल में हमारे न कोई ललक बची थी स्वाधीन होने की ज्वाला ठन्ढी पङी थी छाया था हमपे, पराधीनता के अंधियारे मिली आजादी बापू तेरे सहारे ।। व्यापारी बनके जो आए दुष्ट बङे थे लोलुप दृष्टि से भारत माँ को देख रहे थे कुनीतियों के कुटक्र में फंसते गये हम गुलामी की जंजीरों से बंधते गए हम खो ... »

ऐसा कौन है जिसने, अहिंसा से लङाई जीती हो

जिनके तेज के आगे, चाँद की चमक फीकी हो ऐसा कौन है जिसने, अहिंसा से लङाई जीती हो । बिन गोली- बारूद के चला था फ़िरंगी से उलझनें सोचा भी नहीं था कभी, चला है वो महात्मा बनने हिंसा में वो बल है कहाँ, जीते जो मन को जिसकी एक पुकार पर लगे जन सैलाब उमङने कहाँ ऐसा योगी, ऐसी उपमा दिखती हो ऐसा कौन है जिसने, अहिंसा से लङाई जीती हो । राम राज्य की कल्पना की थी जिसने वर्धा शिक्षा योजना की शुरुआत की उसने करके सीखो ... »

अहिंसा के पुजारी हम

अहिंसा के पुजारी, सत्य, प्रेम , करूणा जैसे मानवीय गुणों की हमें दरकार है । किसानों के हिमायती की दृढ़ता को अपनाने हेतु क्या हम पुनः तैयार हैं । अपनी मानवीय संवेदना को रखना हमें बरकरार है । उत्पीङको के प्रति दया रखने वालों से टकरार है । »

अर्द्धनग्न फकीर

अपनी दुर्वलताओ से भी अवगत करवाकर दुनिया को बताया, अहिंसा अपनाकर अर्द्ध नग्न फकीर कहा था कभी किसीने। बिना अस्त्र-शस्त्र के ही, चले लाठी ठेकाकर महिला, किसान सबको मोहा उन्मुक्त मुस्कराकर अविश्वसनीय है, आजादी दिलाया, कृषकाय वृद्ध ने । »

स्मृतियों से

स्मृतियों के झरोखो से ऐसे शूल निकल आए हम फिर से, मिले घावों को अनजाने ही कुरेद आये। »

इंसाफ

हमारे संविधान की विशेषता असंतुष्टो को भी संतुष्ट होने के अवसर उपलब्ध कराती है यही वजह है कि इंसाफ की प्रक्रिया तारीख़ दर तारीख़ चलती जाती है »

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