ये ख्वाइशें

रेत के महलों की तरह ,हरदम ढहती है ये ख्वाइशें
फिर भी हर पल क्यों सजती सवरती है ये ख्वाइशें

उम्मीदे इन्ही ज़िंदा रखती सांसों में रचती -बसती
पलती-बढ़ती सब चुपचाप सहती है ये ख्वाइशें

एक खवाइश पूरी होते ही अपनी कोख से
दे जाती जनम कोख में पलती है ये ख्वाइशें

इन्हे पूरा होने की आस में रहते बैचेनी की गोद में
जाने -अनजाने दर्द से आलिंगन चाहती है ये ख्वाइशें

कभी होगा खत्म इन ख्वाइशों का अनवरत क्रम
जिंदगी का है अंत पर अमर होती है ये ख्वाइशें

हर खवाइश बंधी आशा की सुनहरी जंजीरों से
जिसे तोड़ने की खवाइश भी ,जन्म देती चंद नई ये ख्वाइशें

कौन कहता है होती नहीं इन ख्वाइशों की जुबान
हर पल टूटती न जाने ,क्या चीखती है ये ख्वाइशें

शायद इन ख्वाइशों और धड़कनों का नहीं कोई रिश्ता
मर जाता है इंसान, पर मरती नहीं है ये ख्वाइशें

लगता इन ख्वाइशों का सच अपनी समझ से परे ‘अरमान’
शायद यही ज़िंदगी है कुछ उम्मीदें और अनंत है ये ख्वाइशें

Comments

5 responses to “ये ख्वाइशें”

  1. Anjali Gupta Avatar
    Anjali Gupta

    what a fine poem!!

    1. rajesh arman Avatar
      rajesh arman

      thanx anjali

    2. rajesh arman Avatar
      rajesh arman

      thanx

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Abhishek kumar

    Wow

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