कुछ तो मजबूरियाँ तेरी भी रहीं होंगी कुछ तो मजबूरियाँ मेरी भी रहीं होंगी ,
सब की मजबूरियों में मजबूर थे हम तेरी नजदीकियों से दूर थे हम ,
अरे जाओं ज़नाब तुम क्या समझोगे दर्द ए दिल को हमारे ,
अपनी खुशियों मे मशगूल थे तुम अपने गमों मे ही चूर थे हम ,
मजबूरियाँ
Comments
3 responses to “मजबूरियाँ”
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kya baat he…very nice
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Thank you
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वाह
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