प्रेम पीपासा

प्रेम पीपासा तृ्प्ती की आस,

भटक रहा जीव अनायास,

प्रेम व्याप्त है अपने अन्दर,

ढूँढ रहा घट-घट के अन्दर,

प्रेम ऐसा अनमोल खज़ाना,

देने से हीं मिल पाता,

माँग रहे सब प्रेम यहाँ

देने को न कोई तैयार,

ढूँढ रहे सब गठबंधन में,

रस्मों के दायरे में बाँध,

ये कहाँ है बँधने वाला,

अविरल ये तो बहने वाला,

प्रेम उन्हीं को मिल पाता,

जो ढूँढे अपने में आप,

प्रेम खज़ाना असीम अपार

बंधन में न इसको बाँध,

प्रेम जीवन की है  प्यास,

ढूँढो इसको अपने पास,

प्रेम पीपासा तृप्ती की आस,

भटक रहा जीव अनायास

Comments

11 responses to “प्रेम पीपासा”

  1. Mikesh Tiwari Avatar
    Mikesh Tiwari

    Behatareen 🙂

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks Mukesh ji

  2. Sonit Bopche Avatar
    Sonit Bopche

    nice lines 😀

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks Sonit ji

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks Dev Rajput ji

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks. Udit ji

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks simran ji

    2. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks Simran ji

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