ये आँखे मेरी निर्झर जैसे झर जाती तो अच्छा होता
जिग्यासा दर्शन की मन में मर जाती तो अच्छा होता |
तुम पथिक मेरे पथ के ही नही तुम दूजे पथगामी हो
मेरे पागल मन से यह प्रीत उतर जाती तो अच्छा होता ||
उपाध्याय…
मुक्तक
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One response to “मुक्तक”
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are waah ji
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