विविध उलझनों में जीवन फंसा हुआ है
किंचित ही दिखने में सुलझे हुए है लोग |
स्वार्थ की पराकाष्ठा पर सांसे है चल रही
अपने बुने जंजाल में उलझे हुए है लोग ||
उपाध्याय…
मुक्तक
Comments
3 responses to “मुक्तक”
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nice line
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Thanks ji
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बढ़िया
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