मुक्तक

विविध उलझनों में जीवन फंसा हुआ है
किंचित ही दिखने में सुलझे हुए है लोग |
स्वार्थ की पराकाष्ठा पर सांसे है चल रही
अपने बुने जंजाल में उलझे हुए है लोग ||
उपाध्याय…

Comments

3 responses to “मुक्तक”

  1. Avantika Singh Avatar
    Avantika Singh

    nice line

  2. राम नरेशपुरवाला

    बढ़िया

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