बिकने दो! शराब अभी
इस गाँव में।
अभी भी कुछ बच्चे स्कूल जाते हैं
घर आकर क ख ग घ गाते हैं।
लेकिन कुछ बच्चे तालाब किनारे
खाली बोतल चुनते है।
कुछ तो खाली बोतल में
पानी डालकर पीते है।
उम्र कम है लेकिन
उनको पापा के जैसे
बनना है।
ये सब देखकर
कमला, बुधिया का ही रोना है।
समारु, बुधारु का क्या कहना-
उनको तो दो पैग अभी
और होना है।
कोई डरता हो,
डर जाये।
कोई मरता हो
मर जाये।
दारु के संग
बस रात चले।
उनके मन में
ये बात चले।
बिकने दो शराब अभी
इस गाँव में।।
सरकारी नौकर बहुत खुश है।
उनके लिए क्या सावन और क्या पूश है।।
अब तो दारू खुद चलकर घर तक आता है।
मोबाइल के एक मैसेज से काम बन जाता है।
गुरुजी बेचारे तो शाम से शुरु होते है।
शाम को शराबी और दिन में गुरु होते हैं।
उनका तो वहाँ बहीखाता है।
दारुवाले से गहरा नाता है॥
तभी तो उन्हे यही समझ आता है
बिकने दो शराब अभी
इस गाँव में।
चुनाव जीताने का वादा है।
मुखिया तो उसका चाचा है।।
हर शाम दो बोतल चाचा के घर जाता है।
दारु के दम पर पंचों पर रौब वह जमाता है।
इसी लिए तो पंचायत में गीत यही वो गाता है।
बिकने दो शराब अभी इस गाँव में।
कुछ नौजवान शाम को आते है।
मूछों पर ताव लगाते हैं।
कहते हैं शराब बेचना बंद करो।
वर्ना थाने हमारे साथ चलो।
दारुवाला समझदार है।
समझ गया बेचारा
ये बेरोजगार है।
सब पीने का बहाना है।
एक पौवा दो प्लेन का
बाकी तो अपना जमाना है।
नौजवान नशे में धूत हुआ।
लगता है वो भूत हुआ।
धूल चांटते जमीन पर
बस यही चिल्लाता है
बिकने दो शराब अभी
इस गाँव में॥
वर्दी वाले भी आते हैं
खाली खोली में
दिमाग लगाते हैं
शायद उनको सब
मालुम है।
बोतल कहाँ पर गुम है।
लगता है सबका अपना हिस्सा है
तभी तो ये किस्सा है
बिकने दो शराब अभी
इस गाँव में।
ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
7693919758

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