एक बेकस इंसान
समाज का जो अंग है
समाज से विभंग है
समाज से वो दूर है
बेबसी से मजबूर है
चाहता है वो भी
सामाजिक बनना
पर बन नही पाता है
इस पूंजी वादी समाज में
खुद को विवश पाता है
उसने जब भी कोशिश की
खुद को बदलने की
अपनी पुरी काया के साथ
सामाजिक ढांचे में ढलने की
अपने घर का आयतन उसे
छोटा ही लगा
एक अनजाने भय से
वो डरा रहा
परिवार को भुख सहना होगा
बेघर हो कर
रहना होगा
तब वो
सामाजिक बन पायेगा
समाज के साथ
कदम मिलाकर
चल पायेगा
उसने महसूस किया है कि
समाज उसके लिए
नही है
समाज हमेशा
पूंजीपतियों का रहा है
गरीब सामाजिक बन कर
सैकड़ों दुख सहा है
उसने उसी समय
सामाजिक बनने का
विचार त्याग दिया
जब आने वाले
अनजाने भय को
उसने याद किया
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