कभी सूनसान गली तो कभी खुले मैदान में पकड़ ली जाती है,
तू क्यों कटी पतंग सी हर बार लूट ली जाती है,
वो चील कौवों से नोचते कभी जकड़ लेते हैं तुझे,
तू क्यों होठों को खामोशी के धागे से यूँ सी जाती है,
किस्से कहानियों, किताबों में रखती थी तू वजूद अपना,
तो आज हर इश्तेहार में तू अपनी हार क्यों दिखाती है॥
~ राही (अंजाना)
औरत

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One response to “औरत”
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सुन्दर रचना
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